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3 बार PM बनने के करीब पहुंचे, फिर भी क्यों अधूरा रह गया बाबू जगजीवन राम का सपना?

स्वतंत्रता सेनानी, हरित क्रांति के सूत्रधार और 1971 युद्ध के रक्षा मंत्री बाबू जगजीवन राम भारतीय राजनीति के सबसे प्रभावशाली नेताओं में रहे. कई बार प्रधानमंत्री पद के प्रबल दावेदार बनने के बावजूद राजनीतिक समीकरण और परिस्थितियों ने उन्हें देश का सर्वोच्च पद नहीं मिलने दिया…

Edited by Rohit Agrawal

Babu Jagjivan Ram Death Anniversary: भारतीय राजनीति के इतिहास में कुछ नेता ऐसे होते हैं जिनकी योग्यता, अनुभव और राष्ट्र सेवा किसी से कम नहीं होती, लेकिन सामाजिक पूर्वाग्रह, राजनीतिक षड्यंत्र और समय की मार उन्हें सर्वोच्च पद से वंचित रख देती है. ऐसे ही एक महान व्यक्तित्व थे बाबू जगजीवन राम , जिन्हें प्यार से बाबूजी कहा जाता था. दलित समुदाय के प्रथम प्रमुख नेता, स्वतंत्रता सेनानी, हरित क्रांति के सूत्रधार और 1971 की विजय के रक्षामंत्री के रूप में उन्होंने देश की सेवा की, लेकिन प्रधानमंत्री पद तीन-चार बार उनके करीब आया और हाथ से निकल गया.

बाबू जगजीवन राम का सफर(Babu Jagjivan Ram Death Anniversary)

5 अप्रैल 1908 को बिहार के चंदवा गांव (आरा, भोजपुरके पास) में एक दलित परिवार में जन्मे जगजीवन राम ने बचपन से ही जातिगत भेदभाव का सामना किया. कलकत्ता विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे 1931 में कांग्रेस में शामिल हुए. 1935 में उन्होंने ऑल इंडिया डिप्रेस्ड क्लासेस लीग की स्थापना की. मात्र 28 वर्ष की आयु में 1936 में वे बिहार विधान परिषद के नामित सदस्य बने और फिर निर्वाचित हुए.

1946 में अंतरिम सरकार में वे सबसे युवा मंत्री बने और लेबर मंत्रालय संभाला. स्वतंत्र भारत में वे लगातार 30 वर्षों से अधिक समय तक विभिन्न मंत्रालयों (रेलवे, परिवहन, संचार, कृषि, रक्षा आदि) में रहे. वे संविधान सभा के सदस्य भी थे और सामाजिक न्याय के प्रबल समर्थक रहे.

– कृषि मंत्री के रूप में उन्होंने हरित क्रांति को गति दी, उन्नत बीजों का प्रचार किया और 1974 के सूखे में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की.
– रक्षा मंत्री (1970-74) के रूप में 1971 के भारत-पाक युद्ध में निर्णायक भूमिका निभाई, जिससे बांग्लादेश का निर्माण हुआ.
– लेबर सुधारों में न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, कर्मचारी राज्य बीमा योजना जैसी महत्वपूर्ण पहलें उनकी देन हैं.
– वे भारत के पहले दलित उप-प्रधानमंत्री बने (जनवरी-जुलाई 1979)

 प्रधानमंत्री पद के लिए मिले कई अवसर

बाबू जगजीवन राम को प्रधानमंत्री पद के लिए कई अवसर मिले, लेकिन हर बार राजनीतिक दांव-पेच और जातिगत पूर्वाग्रहों ने उन्हें रोक दिया. मुख्य मौके निम्नलिखित थे:

1. 1966: लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु के बाद इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं. जगजीवन राम एक मजबूत दावेदार थे, लेकिन कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं और पार्टी की आंतरिक गतिशीलता ने इंदिरा को चुना.

2. 1977: आपातकाल के बाद जनता पार्टी की भारी जीत हुई. इंदिरा गांधी की हार के बाद जगजीवन राम प्रधानमंत्री पद के प्रबल दावेदार थे. उनकी लोकप्रियता, अनुभव और जनता पार्टी में उनका प्रभाव बहुत था. लेकिन मोरारजी देसाई को पद मिला. जगजीवन राम ने रक्षा मंत्री और बाद में उप-प्रधानमंत्री का पद संभाला.

3. 1979 (जुलाई-अगस्त): जनता पार्टी सरकार के पतन के समय चरण सिंह और जगजीवन राम के बीच टकराव हुआ. जगजीवन राम ने सरकार बनाने का दावा किया, लेकिन राष्ट्रपति ने चरण सिंह को मौका दिया. फिर लोकसभा भंग कर दी गई, जिससे फिर मौका निकल गया. कुछ स्रोत इसे चौथा मौका भी मानते हैं.

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6 जुलाई को पंचतत्व में हो गए विलीन

6 जुलाई 1986 को दिल्ली में उनका निधन हुआ. उन्होंने दलित उत्थान, सामाजिक समानता और राष्ट्र निर्माण के लिए जीवन समर्पित किया. आज भी वे दलित राजनीति और सामाजिक न्याय के प्रतीक बने हुए हैं. उनके योगदान को याद करते हुए कहा जाता है कि पद की जगह राष्ट्रसेवा उनका असली मिशन था.

बाबू जगजीवन राम की कहानी सिर्फ व्यक्तिगत विफलता की नहीं, बल्कि भारतीय समाज में बने जातिगत अवरोधों की भी है. वे साबित करते हैं कि योग्यता अकेले काफी नहीं होती — राजनीति में समर्थन और समय भी जरूरी है. लेकिन उनकी मेहनत और दूरदृष्टि आज भी प्रेरणा देती है.

-भारत एक्सप्रेस

 



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