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जीते तो बादशाह, हारे तो इतिहास… बांकीपुर में पीके के लिए करो या मरो जैसी स्थिति क्यों?

Bankipur Byelection: बांकीपुर उपचुनाव में जातीय समीकरण अहम भूमिका निभा रहा है. प्रशांत किशोर पहली बार चुनावी मैदान में हैं और उनके सामने एनडीए व आरजेडी दोनों की चुनौती है.

Bankipur Byelection: जनसुराज पार्टी के सिंबल पर चुनाव लड़ रहे प्रशांत किशोर के लिए यह सीट बेहद अहम है. वे लगातार डोर टू डोर कैंपेन कर रहे हैं और इस उपचुनाव को सम्राट सरकार के खिलाफ जनमत संग्रह बता रहे हैं. पीके की कोशिश है कि किसी भी तरह जीत हासिल कर बिहार की राजनीति में अपनी पकड़ मजबूत करें.

उपचुनाव से करियर खत्म होने की मिसालें

  • बिहार की राजनीति में कई बड़े नेताओं का करियर उपचुनाव हारने के बाद खत्म हो चुका है.
  • पीके शाही, जो कभी नीतीश कुमार के करीबी और शिक्षा मंत्री रहे. 2013 के महाराजगंज उपचुनाव में हार गए और राजनीति से बाहर हो गए.
  • किशोरी सिन्हा, वैशाली उपचुनाव 1994 में हार गईं और उनका राजनीतिक सफर वहीं थम गया.
  • राम नरेश पांडे 2015 के हरलाखी उपचुनाव में भीतरघात के चलते हार गए और फिर कोई चुनाव नहीं जीत पाए.
  • बीमा भारती 2024 लोकसभा और रूपौली उपचुनाव दोनों में हार गईं और अब साइडलाइन हो चुकी हैं.

जातीय समीकरण

बांकीपुर विधानसभा सीट पर कुल वोटर्स की संख्या लगभग 3.80 लाख है. जातीय समीकरण इस सीट पर बेहद अहम माना जाता है. यहां कायस्थ समुदाय के करीब 70 हजार वोटर हैं जबकि बनिया समाज के लगभग 60 हजार मतदाता हैं. दलितों की संख्या 31 हजार, मुस्लिम 30 हजार, कोइरी-कुर्मी 30 हजार, यादव 30 हजार और राजपूत भी लगभग 30 हजार हैं. भूमिहार समुदाय के करीब 25 हजार वोटर हैं, ब्राह्मण 20 हजार और अन्य वर्गों के लगभग 54 हजार मतदाता इस सीट पर मौजूद हैं. यही समीकरण बांकीपुर की राजनीति को दिलचस्प बनाता है.

क्यों जरूरी है जीत?

पीके के सामने एनडीए और आरजेडी दोनों हैं. उनकी रणनीति आरजेडी को तीसरे नंबर पर धकेलने की है. अगर वे इसमें सफल नहीं होते तो इसका असर उनकी पार्टी पर पड़ेगा. पहले ही केसी सिन्हा जैसे नेता उनका साथ छोड़ चुके हैं. हार की स्थिति में जनसुराज पार्टी में भगदड़ मच सकती है.

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बांकीपुर की चुनौती

2025 के चुनाव में इस सीट पर बीजेपी के नितिन नबीन ने जीत दर्ज की थी और अब वे पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. उस चुनाव में जनसुराज उम्मीदवार को केवल 7700 वोट मिले थे. इस बार बीजेपी ने पीके के खिलाफ नीरज भारती जैसे साधारण कार्यकर्ता को उतारा है. पार्टी की रणनीति है कि एक सामान्य उम्मीदवार से भी पीके को मात दी जाए.

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-भारत एक्सप्रेस

 

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