झारखंड में बीजेपी का बड़ा दांव
भारतीय जनता पार्टी ने झारखंड में संगठनात्मक बदलाव करते हुए मध्य प्रदेश के आदिवासी नेता और खरगोन से सांसद गजेंद्र सिंह पटेल को प्रदेश प्रभारी नियुक्त किया है. उनके साथ छत्तीसगढ़ के पूर्व विधायक सौरभ सिंह और बिहार की निवेदिता सिंह को सह प्रभारी बनाया गया है. यह नियुक्तियां 23 सितंबर 2026 से लागू हो गई हैं. पार्टी का मकसद साफ है, 2024 की हार से सबक लेकर आदिवासी समाज में अपनी पकड़ मजबूत करना.
गजेंद्र पटेल का राजनीतिक सफर
गजेंद्र सिंह पटेल मध्य प्रदेश के खरगोन-बड़वानी लोकसभा क्षेत्र से लगातार दूसरी बार सांसद बने हैं. उनका जन्म 16 फरवरी 1975 को बड़वानी में हुआ. उन्होंने बीए और एलएलबी की पढ़ाई की है और लंबे समय से कृषि और राजनीति से जुड़े रहे हैं. 2019 में पहली बार लोकसभा पहुंचे और 2024 में दोबारा निर्वाचित हुए. वर्तमान में वे सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता संबंधी संसदीय समिति के सदस्य हैं. अगस्त 2026 में उन्हें बीजेपी का राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया था. आदिवासी समाज से आने वाले पटेल की नई जिम्मेदारी झारखंड में पार्टी के लिए खास मायने रखती है.
आदिवासी वोट बैंक सबसे बड़ी चुनौती
झारखंड की राजनीति में आदिवासी मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं. 2024 के विधानसभा चुनाव से पहले हेमंत सोरेन के जेल जाने के बावजूद झारखंड मुक्ति मोर्चा ने आदिवासी भावना को इतना मजबूत किया कि बीजेपी को नुकसान उठाना पड़ा. उस समय पार्टी के बड़े रणनीतिकार भी हालात नहीं संभाल पाए. नतीजा यह हुआ कि हेमंत सोरेन आदिवासी समाज के सबसे बड़े नेता के रूप में उभरे. ऐसे में बीजेपी ने आदिवासी पृष्ठभूमि वाले गजेंद्र पटेल को प्रदेश प्रभारी बनाकर यह संकेत दिया है कि वह आदिवासी समाज में अपनी खोई हुई पकड़ वापस पाना चाहती है.
सह प्रभारियों की भूमिका
गजेंद्र पटेल के साथ सौरभ सिंह और निवेदिता सिंह को भी अहम जिम्मेदारी दी गई है. सौरभ सिंह छत्तीसगढ़ के अकलतरा से विधायक रह चुके हैं और संगठन में काम करने का लंबा अनुभव रखते हैं. निवेदिता सिंह बिहार से आती हैं और संगठनात्मक कार्यों में सक्रिय रही हैं. दोनों का काम पटेल के साथ मिलकर झारखंड में पार्टी की गतिविधियों को बेहतर ढंग से संचालित करना और कार्यकर्ताओं के बीच तालमेल बढ़ाना होगा.
क्यों चुने गए पटेल?
बीजेपी ने गजेंद्र पटेल को झारखंड का प्रभारी इसलिए बनाया क्योंकि उनकी आदिवासी पृष्ठभूमि पार्टी को आदिवासी इलाकों में संवाद का नया चेहरा दे सकती है. पार्टी चाहती है कि बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत किया जाए और आदिवासी मतदाताओं में विश्वास पैदा किया जाए. सौरभ और निवेदिता का अलग-अलग राज्यों का अनुभव टीम को क्षेत्रीय दृष्टिकोण देगा.
संगठनात्मक रणनीति
नई टीम के सामने सबसे बड़ी चुनौती बूथ स्तर पर संगठन को मजबूत करना, पुराने कार्यकर्ताओं को सक्रिय करना और नए सामाजिक समूहों तक पहुंच बनाना होगी. साथ ही प्रदेश नेतृत्व के साथ तालमेल बैठाना भी जरूरी होगा. खास बात यह है कि झारखंड के दो नेताओं प्रदीप वर्मा और अनंत ओझा को उत्तर प्रदेश का सह प्रभारी बनाया गया है. इससे साफ है कि केंद्रीय नेतृत्व झारखंड के नेताओं की क्षमता पर भरोसा करता है और उन्हें बड़े राज्यों में भी जिम्मेदारी देना चाहता है.
दिग्गज नेताओं को साथ रखना
झारखंड बीजेपी के लिए एक और मुश्किल यह होगी कि प्रदेश के बड़े नेताओं को एक मंच पर बनाए रखा जाए. रघुवर दास, अर्जुन मुंडा, चंपई सोरेन और मधु कोड़ा जैसे कई दिग्गज नेता हैं जो मुख्यमंत्री रह चुके हैं. नई टीम को इन सबके साथ तालमेल बैठाकर संगठन को आगे बढ़ाना होगा.
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गजेंद्र पटेल की नियुक्ति को केवल प्रभारी बदलने की कवायद नहीं माना जा रहा है. इसे संगठन को नई दिशा देने और आदिवासी समाज में पार्टी की खोई हुई प्रतिष्ठा वापस लाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है. असली परीक्षा यह होगी कि नई टीम झारखंड में आदिवासी क्षेत्रों समेत पूरे प्रदेश में बीजेपी के संगठनात्मक आधार को कितना मजबूत कर पाती है.
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-भारत एक्सप्रेस
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