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मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की क्या है प्रक्रिया? क्या कांग्रेस रच पायेगी इतिहास, जानें सबकुछ…

CEC Removal: मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया भी संसद से शुरू होती है. संसद के किसी भी सदन में मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने का प्रस्ताव लाया जा सकता है. अगर प्रस्ताव लोकसभा में लाया जाता है तो प्रस्ताव के समर्थन में 100 सांसदों का हस्ताक्षर जरूरी है.

CEC Removal

CEC Removal: बिहार में चल रहे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर पूरे देश में सियासी घमासान छिड़ा हुआ है. विपक्ष जहां SIR को लेकर चुनाव आयोग पर ‘वोट चोरी’ का आरोप लगा रहा है. वहीं रविवार को चुनाव आयोग के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर विपक्ष के सभी सवालों का एक-एक कर जवाब दिया और विपक्ष के वोट चोरी के आरोपों को गलत बताया. उन्होंने बिना नाम लिये राहुल गांधी को हलफनामा दायर करने या देश से माफी मांगने को कहा है. जिसके बाद अब विपक्ष चुनाव आयोग को निशाने पर ले लिया है.

अब चर्चा चल रही है कि विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को उनके पद से हटाने के लिए प्रस्ताव ला सकती है. हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन कांग्रेस नेता सैयद नासिर हुसैन ने इसकी तरफ इशारा जरूर किया है.

“जरूरत पड़ी तो कांग्रेस ला सकती है प्रस्ताव”

उन्होंने सोमवार को कहा कि इस मुद्दे पर पार्टी के भीतर अभी तक कोई चर्चा तो नहीं चल रही है, लेकिन अगर जरूरत पड़ी तो नियमों के अनुसार कांग्रेस प्रस्ताव ला सकती है. अगर कांग्रेस प्रस्ताव लाकर मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने में सफल हो जाती है, तो यह स्वतंत्र भारत के इतिहास की बहुत बड़ी घटना होगी. क्योंकि आजतक किसी भी मुख्य चुनाव आयुक्त को प्रस्ताव लाकर उन्हें उनके पद से नहीं हटाया गया है.

मुख्य चुनाव आयुक्त को कैसे हटाया जा सकता है?

मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया देश के हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के जजों को हटाने की तरह ही होती है. बस नाम दूसरा होता है. जहां जजों को हटाने की प्रक्रिया को महाभियोग कहा जाता है, तो वहीं मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया को बस “हटाने की प्रक्रिया” कहा जाता है.

मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया बेहद की कठीन और जटिल मानी जाती है. जो संविधान के आर्टिकल 324 में दी गई है. देश में संविधान को बने रहने के लिए चुनाव का होना बेहद जरूरी है. इसलिए संविधान में ये खास ध्यान रखा गया है कि चुनाव आयोग को राजनीतिक दबाव से मुक्त रखा जाए. ताकि वो स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से काम करता रहे.

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क्या है वो प्रक्रिया?

मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया भी संसद से शुरू होती है. संसद के किसी भी सदन में मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने का प्रस्ताव लाया जा सकता है. अगर प्रस्ताव लोकसभा में लाया जाता है तो प्रस्ताव के समर्थन में 100 सांसदों का हस्ताक्षर जरूरी है. वहीं अगर राज्यसभा में लाया जाता है तो फिर 50 सांसदों का हस्ताक्षर जरूरी है. मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए ‘दुर्व्यवहार’ या ‘अक्षमता’ का आरोप साबित करना पड़ता है.

तीन सदस्यीय समिति करती है जांच

प्रस्ताव पेश होने के बाद इसे संबंधित सदन के स्पीकर (लोकसभा) या चेयरमैन (राज्यसभा) इसपर विचार करते हैं. वो इस प्रस्ताव को स्वीकर या अस्वीकार करने के लिए स्वतंत्र होते हैं. अगर उन्होंने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया तो फिर आरोपों की जांच के लिए वो तीन सदस्यीय समिति का गठन करते हैं. जिसकी अगुवाई सुप्रीम कोर्ट के एक जज करते हैं. वहीं इस तीन सदस्यीय कमेटी में किसी भी हाईकोर्ट के एक चीफ जस्टिस और एक प्रतिष्ठित न्यायविद शामिल होते हैं. जांच के बाद इस समिति के द्वारा पेश किये गए रिपोर्ट पर सदन में चर्चा होती है.

चुनाव आयुक्त को अपना पक्ष रखने का दिया जाता है मौका

यह कमेटी जांच के दौरान मुख्य चुनाव आयुक्त को अपना पक्ष रखने को मौका देती है. कमेटी जांच पूरी होने के बाद रिपोर्ट चेयरमैन या स्पीकर को सौंप देती है. अगर कमेटी मुख्य चुनाव आयुक्त के आरोपों को सही पाती है तो फिर उन्हें हटाने की प्रक्रिया आगे बढ़ती है.

कमेटी के द्वारा पेश रिपोर्ट को फिर सदन में चर्चा के लिए लाया जाता है.. इस प्रस्ताव को बहुमत (यानी 50 प्रतिशत से ज्यादा) और उपस्थित या मतदान करने वाले सदस्यों के दो तिहाई बहुमत से पारित होना जरूरी होता है. इसे ‘विशेष बहुमत’ कहा जाता है.

एक सदन से दूसरे सदन में भेजी जाती है रिपोर्ट

एक सदन में पारित होने के बाद इस रिपोर्ट को दूसरे सदन में भेज दिया जाता है. जहां वहां भी उसे विशेष बहुमत से पास होना जरूरी होता है. अगर लोकसभा और राज्यसभा दोनों जगहों से यह जांच रिपोर्ट विशेष बहुमत से पास हो जाता है. तो फिर इसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है.

जिसके बाद राष्ट्रपति मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने के आदेश जारी कर देते हैं. गौरतलब है कि ये पूरी प्रक्रिया एक ही सत्र में होना जरूरी है.

बीजेपी ने 2006 में की थी कोशिश

अगर कांग्रेस के द्वारा प्रस्ताव लाया जाएगा या नहीं ये तो भविष्य के गर्भ में है, लेकिन यूपीए के शासनकाल में बीजेपी ने 2006 में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एन गोपालास्वामी ने चुनाव आयुक्त नवीन चावला पर पक्षपाती रवैया अपनाने का आरोप लगाया था और राष्ट्रपति से उन्हें हटाने की सिफारिश की थी. इसके बाद बीजेपी चुनाव आयुक्त नवीन चावला को हटाने के लिए प्रस्ताव लेकर आई थी. जिसपर 200 से ज्यादा सांसदों के हस्ताक्षर थे. हालांकि तब के लोकसभा स्पीकर सोमनाथ चटर्जी ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था.

– भारत एक्सप्रेस



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