सांकेतिक फोटो
बठिंडा : “बेटा पुलिस के पास गया था, वापस लाश बनकर आया” – यह दर्दनाक शब्द हैं डॉ. जोगिंदर सिंह के, जिनका 34 वर्षीय बेटा नरेंद्रजीत सिंह अब इस दुनिया में नहीं है. उसकी मौत एक हादसा नहीं, सिस्टम की बर्बरता की जीती-जागती मिसाल है.
पंजाब की धरती, जो कभी इंसाफ और वीरता के लिए जानी जाती थी, अब एक खौफनाक सच के साये में है – पुलिस कस्टडी में मौत. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या आज का सच ये है कि जिस पुलिस से इंसाफ की उम्मीद की जाती है, वही इंसानियत को थर्ड डिग्री टॉर्चर से कुचल देती है?
नरेंद्रजीत की मौत: थाने से श्मशान तक का सफर
नरेंद्रजीत सिंह अपने दोस्त के साथ घर से निकला. दो दिन बाद, वह पुलिस कस्टडी में था, और अगले ही दिन उसका शरीर पोस्टमार्टम टेबल पर पड़ा था. सीआईयू-2 में कथित थर्ड डिग्री टॉर्चर के दौरान उसकी जान चली गई. पुलिस ने पहले इसे “स्वाभाविक मौत” बताया. लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने साफ किया – शरीर पर गहरी चोटों के निशान थे, जो बर्बर पिटाई की ओर इशारा करते हैं.
सवालों के कटघरे में पंजाब पुलिस
•क्यों हर बार हिरासत में मौत को “बीमारी”, “दौरा” या “दिल का दौरा” बताया जाता है?
•क्या पुलिस थानों में कैमरे सिर्फ दिखावे के लिए लगे हैं?
•किस आधार पर एक आम युवक को बिना ठोस सबूत के घंटों तक पीटा जाता है?
•क्यो सस्पेंड करने की जगह ऐसे अफसरों को विभागीय सुरक्षा दी जाती है?

ये पहली बार नहीं… पंजाब पुलिस का ‘इतिहास’ खौफनाक है:
•2023, फिरोजपुर: एक दलित युवक की लॉकअप में मौत, परिवार को मुंह बंद रखने के लिए पैसे की पेशकश.
•2024, लुधियाना: महिला से थाने में उत्पीड़न, न्याय की मांग पर केस दर्ज नहीं किया गया.
•अब 2025, बठिंडा: नरेंद्रजीत की मौत – मौत नहीं, सिस्टम की हत्या.
वीडियो बना गवाह, जनता बनी जज
इस बार सरकार और सिस्टम ने जो छिपाना चाहा, सोशल मीडिया ने उसे उजागर कर दिया. वायरल वीडियो में मृतक का दोस्त साफ कहता है – “हमसे जबरन कबूलनामे के लिए कहा गया, पैसे मांगे गए, नरेंद्र को पीटा गया.”
इस वीडियो ने वो कर दिया, जो FIR नहीं कर पाई – सच्चाई उजागर
•क्या केवल तीन पुलिसवालों पर गैर इरादतन हत्या का केस ही काफी है?
•क्या उन अफसरों पर भी कार्रवाई होगी जो ऐसे अफसरों को बचाते हैं?
•क्या नरेंद्रजीत की मौत आखिरी होगी?
पंजाब पुलिस पर भरोसा तब तक अधूरा रहेगा, जब तक थानों की दीवारें इंसाफ से ज्यादा डर पैदा करती हैं. अब वक्त आ गया है कि सिर्फ नाम बदलने की नहीं, सोच बदलने की ज़रूरत है.
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