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13 साल कोमा में रहने के बाद हरीश राणा ने छोड़ी दुनिया, दिल्ली में अंतिम विदाई, पिता बोले- ‘कोई भी रोए नहीं…’

13 साल कोमा में रहने के बाद हरीश राणा ने दो दिन पहले दुनिया को अलविदा कह दिया. दिल्ली में अंतिम विदाई दी गई, इस दौरान उनके पिता ने लोगों से कहा- “कोई रोना मत, ताकि मेरा बेटा शांति से दुनिया से जाए”

harish rana funeral
Vijay Ram Edited by Vijay Ram

Coma Patient Harish Rana Death: दिल्ली के ग्रीन पार्क मुक्तिधाम में 25 मार्च को हरीश राणा की अंतिम यात्रा निकाली गई. 13 साल तक कोमा में रहने के बाद 24 मार्च को हरीश राणा ने आखिरी सांस ली थी. उनके पिता ने वहां मौजूद लोगों से भावुक अपील की.

पिता की भावुक अपील

हरीश राणा की अंतिम यात्रा में पिता ने कहा, “कोई रोना मत, हम चाहते हैं बेटा शांति से जाए.” उन्होंने सभी से अनुरोध किया कि वे रोएं नहीं और बेटे को शांति से विदा दें. यह पल हर किसी को भावुक कर गया. लोग पिता के दर्द और साहस दोनों को देख रहे थे.

13 साल बाद ‘इच्‍छा मृत्यु’

हरीश राणा लंबे समय से कोमा में थे. उनके परिवार ने इन 13 सालों में बहुत संघर्ष किया. आखिरकार 24 मार्च को उनकी मौत हो गई. अगले दिन परिवार और रिश्तेदार उन्हें अंतिम विदाई देने पहुंचे. मुक्तिधाम में शोक की लहर थी, लेकिन पिता की बात ने सबको सोचने पर मजबूर कर दिया.

राणा के परिवार का दर्द

पिता ने अपनी बात में बेटे के लिए शांति की कामना की. उन्होंने कहा कि रोने से बेटे की आत्मा को कष्ट होगा. इसलिए सब शांत रहें और बेटे को शांति से जाने दें. यह संदेश सोशल मीडिया पर भी तेजी से फैल रहा है. कई लोग पिता के साहस की तारीफ कर रहे हैं.

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इस हादसे ने बदल दी थी जिंदगी

हरीश राणा की जिंदगी का दुखद मोड़ साल 2013 में आया था. उस समय हरीश चंडीगढ़ में रहकर अपनी पढ़ाई कर रहे थे. एक दुर्भाग्यपूर्ण हादसे में वे अपने हॉस्टल की चौथी मंजिल से नीचे गिर गए, जिससे उनके सिर में गंभीर चोटें आईं. इस हादसे ने उन्हें 100 फीसदी दिव्यांग बना दिया और वे ऐसी अचेत अवस्था में चले गए जहाँ से वापसी की कोई उम्मीद नहीं थी. पिछले 13 सालों से हरीश न तो बोल सकते थे, न चल सकते थे और न ही किसी संवेदना को महसूस कर सकते थे. बिस्तर पर लेटे-लेटे उनके शरीर पर गहरे घाव (Bedsores) हो गए थे. उनके वृद्ध माता-पिता ने एक दशक से ज्यादा समय तक उनकी सेवा की, लेकिन जब सुधार की सारी उम्मीदें खत्म हो गई और बेटे का कष्ट असहनीय हो गया तब उन्होंने भारी मन से न्यायपालिका का दरवाजा खटखटाया. सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर ‘इच्छा मृत्यु’ मिली.



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