Bihar News: सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में बिहार (Bihar) में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर दायर याचिकाओं पर सुनवाई हुई. ये मुद्दा इतना संवेदनशील है कि अदालत ने इसे “लोकतंत्र की जड़ों से जुड़ा” बताया, क्योंकि मामला वोट देने के अधिकार से संबंधित है.
जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने क्या कहा ?
जस्टिस सुधांशु धूलिया (Justice Sudhanshu Dhulia) और जस्टिस जॉयमाल्या बागची (Justice Joymalya Bagchi) की बेंच ने साफ कहा कि याचिकाकर्ता चुनाव आयोग की ताकत, प्रक्रिया और समय को चुनौती दे रहे हैं. कपिल सिब्बल और गोपाल शंकर नारायण ने याचिकाकर्ताओं की ओर से दलीलें दीं. जबकि पूर्व अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल और वकील राकेश द्विवेदी ने आयोग की तरफ से अपना पक्ष रखा.

11 दस्तावेज जरूरी- नारायण
वकील नारायण ने कहा कि इस बार 11 दस्तावेजों को जरूरी बताया गया है. जबकि ऐसा कोई नियम न आरपी एक्ट में है और ना चुनावी कानूनों में हैं. ये भेदभावपूर्ण है और साफ-साफ मनमाना रवैया दिखाता है. आयोग कहता है कि 1 जनवरी 2003 के बाद नाम जुड़वाने वालों को डॉक्यूमेंट देने होंगे. नारायण ने ये भी बताया कि सूची की समरी समीक्षा पहले ही हो चुकी है, तो दुबारा करने का मतलब क्या है.
जस्टिस धूलिया ने क्या कहा ?
जस्टिस धूलिया ने कहा कि सिर्फ यह कहना काफी नहीं है कि आयोग गलत कर रहा है. आपको ये तर्क देकर साबित करना होगा. आयोग ने कोर्ट को बताया कि आधार कार्ड सिर्फ एक पहचान का जरिया है बल्कि नागरिकता का नहीं है. 60 फीसदी लोगों ने फॉर्म भर दिए हैं और प्रोसेस आगे भी चल रहा है.
28 जुलाई को अगली सुनवाई
कोर्ट ने कहा कि वो आयोग की प्रक्रिया में दखल नहीं देगा. क्योंकि चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है. आयोग ने भी कहा कि प्रक्रिया पूरी करने दीजिए, बाद में फैसला किया जा सकता है. कोर्ट ने ड्राफ्ट प्रकाशन रोकने से मना कर दिया और 28 जुलाई को अगली सुनवाई तय की है. पूरे मामले में कोर्ट का रुख साफ रहा. वोट का अधिकार अहम है, लेकिन चुनाव आयोग को भी अपना काम करने देना चाहिए.
-भारत एक्सप्रेस
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