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सरकारी अस्पताल में कॉटन स्वैब और डॉक्टरों की कमी के चलते नाबालिग लड़के का इलाज करने से किया इनकार तो हाईकोर्ट ने लिया संज्ञान

दिल्ली हाईकोर्ट में दायर याचिका में दावा किया गया है कि कॉटन की कमी और डॉक्टरों की अनुपलब्धता के कारण लड़के को इलाज से इनकार करना मनमाना, अन्यायपूर्ण, दुर्भावनापूर्ण, भेदभावपूर्ण, अनैतिक है.

Rohit Rai Edited by Rohit Rai

दिल्ली हाईकोर्ट ने कॉटन स्वैब के अभाव और डॉक्टरों की अनुपलब्धता के कारण सरकारी अस्पताल में एक नाबालिग लड़के को चिकित्सा उपचार से इनकार करने के मामले को गंभीरता से लिया है। अदालत ने दिल्ली सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने दिल्ली सरकार को 10 दिनों के भीतर स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है। उन्होंने निर्देश दिया कि रिपोर्ट में दिल्ली सरकार द्वारा संचालित अन्य अस्पतालों की स्थिति का भी संकेत दिया जाए। अदालत ने मामले की सुनवाई 30 मई तय की है।

क्या है मामला?

1 अप्रैल को याचिकाकर्ता तीसरी कक्षा का छात्र अपने स्कूल में खेलते समय गिर गया और उसके बाएं हाथ में फ्रैक्चर हो गया। उन्हें डॉ. हेडगेवार आरोग्य संस्थान के आपातकालीन वार्ड में ले जाया गया जहां डॉक्टरों ने उन्हें हायर सेंटर रेफर कर दिया। याचिका में कहा गया है कि ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टर ने लड़के के आपातकालीन कार्ड पर कॉटन एनए लिखा और लड़के को वही खरीदने की सलाह दी गई। सुरक्षा गार्ड के रूप में काम करने वाले लड़के के पिता उसे चाचा नेहरू बाल चिकित्सालय ले गए, जहां उन्हें बताया गया कि कोई डॉक्टर उपलब्ध नहीं है क्योंकि शाम के 5.30 बज चुके थे और डॉक्टर 3 बजे अस्पताल छोड़ चुके थे। सरकारी अस्पताल में इलाज का कोई अन्य विकल्प नहीं होने पर याचिकाकर्ता ने एक निजी क्लिनिक से संपर्क किया जिसने उसे चंद्र लक्ष्मी अस्पताल में रेफर कर दिया। लगभग 12.30 बजे अंततः उनके बाएं हाथ पर प्लास्टर लगाया गया।

याचिका में कही गई ये बात

वकील अशोक अग्रवाल और कुमार उत्कर्ष द्वारा दायर याचिका में कहा गया है कि याचिकाकर्ता की मां एक नौकरानी के रूप में काम करती है और उसने अपने नियोक्ता से 12,000 रुपये उधार लिए और चंद्र लक्ष्मी अस्पताल के बिल का भुगतान किया। सरकारी अस्पतालों में इलाज से इनकार करने के खिलाफ याचिकाकर्ता ने अपने वकील के माध्यम से 6 अप्रैल को सरकार को कानूनी नोटिस देकर अपने खर्चों की प्रतिपूर्ति और 1 लाख रुपये के मुआवजे की मांग की। हालांकि अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली है।

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याचिका में दिल्ली सरकार को 12,000 रुपये के चिकित्सा खर्च की प्रतिपूर्ति करने और याचिकाकर्ता को 1 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश देने की मांग की गई है। याचिका में दावा किया गया है कि कॉटन की कमी और डॉक्टरों की अनुपलब्धता के कारण लड़के को इलाज से इनकार करना मनमाना, अन्यायपूर्ण, दुर्भावनापूर्ण, भेदभावपूर्ण, अनैतिक है और संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत उसे दिए गए स्वास्थ्य के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है। इसमें यह भी कहा गया है कि दिल्ली सरकार अपने निवासियों को मुफ्त और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य देखभाल प्रदान करने के अपने संवैधानिक दायित्व को निभाने में बुरी तरह विफल रही है।



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