Israel Iran Conflict: इजराइल के हालिया हमलों के बाद ईरान की गलियों में युद्ध की आहट साफ सुनी जा सकती है. दुनिया भर के देश अपने नागरिकों को तेहरान और मशहद छोड़ने की सलाह दे रहे हैं, एडवाइजरी जारी हो रही हैं और ‘ऑपरेशन सिंधु’ जैसी चर्चाएं फिर से जोर पकड़ रही हैं. लेकिन, इन सबके बीच एक दिलचस्प और हैरान करने वाली हकीकत यह है कि कश्मीर के सैकड़ों नौजवानों के लिए आज भी ईरान सिर्फ एक देश नहीं, बल्कि उनके सपनों की ‘पनाहगाह’ बना हुआ है.
आखिर क्या वजह है कि जब पूरी दुनिया ईरान से दूरी बना रही है, तब कश्मीर का युवा वहीं जाने की जिद पर अड़ा रहता है. आइये समझने की कोशिश करें भारतीय कश्मीरी छात्रों को ईरान में ऐसा क्या मिलता है?
कश्मीर जैसा ‘ईरान-ए-सगीर’
कश्मीर को अक्सर ‘ईरान-ए-सगीर’ (छोटा ईरान) कहा जाता है. यह जुड़ाव आज का नहीं, सदियों पुराना है. जब कश्मीर के ऊंचे पहाड़ों से कोई छात्र तेहरान या कुम की सड़कों पर उतरता है, तो उसे वहां का मौसम, वास्तुकला और खान-पान अजनबी नहीं लगता.
विशेषज्ञों का मानना है कि कश्मीरी छात्रों के लिए ईरान का चुनाव केवल एक ‘मजबूरी’ नहीं, बल्कि ‘सहजता’ है. वहां की सर्द हवाएं और चिनार जैसे दिखने वाले पेड़ उन्हें घर की याद दिलाते हैं. यही ‘सांस्कृतिक कंफर्ट जोन’ उन्हें युद्ध के डर से ऊपर ले जाता है.
NEET की दीवार पर किफायती रास्ता
भारत में मेडिकल की पढ़ाई एक ‘अग्निपरीक्षा’ जैसी है. जहां 23 लाख छात्र मात्र 1 लाख सीटों के लिए लड़ते हैं, वहां निजी कॉलेजों की करोड़ों की फीस मध्यमवर्गीय कश्मीरी परिवारों के बस से बाहर होती है. ऐसे में ईरान एक ‘मसीहा’ बनकर उभरता है. जहां पड़ोसी देशों में MBBS का खर्च 60 लाख तक जाता है, वहीं ईरान की प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटीज (जैसे शाहिद बेहिश्ती और तेहरान यूनिवर्सिटी) में यह 15 से 30 लाख रुपये में सिमट जाता है.
यहां की डिग्रियों को भारत का राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) और वर्ल्ड डायरेक्टरी ऑफ मेडिकल स्कूल्स (WDOMS) मान्यता देता है, जिससे छात्रों का भविष्य सुरक्षित रहता है. एक यह भी कारण है कि कश्मीर के छात्रों की ईरान काफी पसंद आता है.
रूहानी सुकून की तलाश
शिक्षा केवल मेडिकल तक सीमित नहीं है. कश्मीर के शिया समुदाय के लिए ईरान का कुम और मशहद शहर ‘मक्का’ के समान महत्व रखते हैं. सद्दाम हुसैन के दौर में जब इराक का नजफ अस्थिर हुआ, तो कुम धार्मिक शिक्षा का सबसे बड़ा वैश्विक केंद्र बन गया.
ईरानी सरकार इन छात्रों के लिए ‘सखी’ की भूमिका निभाती है. धार्मिक शिक्षा के लिए जाने वाले छात्रों की पूरी पढ़ाई, रहने और खाने का खर्च अक्सर वहां की सरकार या धार्मिक संस्थाएं उठाती हैं. यह आर्थिक सुरक्षा छात्रों को युद्ध के खतरे के बावजूद वहां टिके रहने का हौसला देती है.
यूक्रेन संकट से लिया सबक
हाल के वर्षों में यूक्रेन और रूस के बीच छिड़ी जंग ने भारतीय छात्रों को बड़ा सबक दिया है. कश्मीरी छात्रों का मानना है कि ईरान का बुनियादी ढांचा और वहां की सरकार की अपने सिस्टम पर पकड़ इतनी मजबूत है कि वे किसी भी आपात स्थिति से निपट सकते हैं. इसके अलावा, भारत सरकार की सक्रियता (ऑपरेशन सिंधु जैसे प्रयास) छात्रों को यह भरोसा दिलाती है कि ‘संकट के समय वतन उनके साथ खड़ा है.’
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डर और उम्मीद के बीच का सेतु
ईरान और इज़राइल के बीच तनाव (Israel Iran Conflict:) की खबरें आती रहेंगी, मिसाइलें भी चलेंगी, लेकिन कश्मीर के युवाओं के लिए ईरान एक ऐसा इल्म का दरिया है, जो कभी नहीं सूखता. यह झुकाव केवल डिग्री लेने तक सीमित नहीं है, यह एक रूहानी जुड़ाव है जो सरहदों और युद्धों की सीमाओं को नहीं मानता. बारूद की गंध के बीच भी वहां की यूनिवर्सिटीज में गूंजती कश्मीरी छात्रों की आवाज़ें इस बात का प्रमाण हैं कि शिक्षा की भूख, युद्ध के डर से कहीं बड़ी होती है.
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