जगदीप धनखड़ का इस्तीफा मंजूर
Jagdeep Dhankhar Resignation: भारत के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ (Jagdeep Dhankhar) ने आज कुछ स्वास्थ्य कारणों का हवाला देकर तत्काल प्रभाव से अपने पद से इस्तीफा दे दिया. यह निर्णय ऐसे समय में लिया गया, जबकि उनका कार्यकाल पूरा होने में काफी समय बचा था. वे 2027 तक इस पद पर रह सकते थे. अभी इस्तीफा देने के कारण वे देश के इतिहास में कार्यकाल पूरा न करने वाले तीसरे उपराष्ट्रपति बन गए हैं.
जगदीप धनखड़ (Jagdeep Dhankhar) ऐसे राजनेता हैं, जिनका राजनीतिक और कानूनी करियर काफी लंबा और प्रभावशाली रहा है. आइए उनके जीवन, शिक्षा, और राजनीतिक यात्रा पर यहां एक नजर डालते हैं.
शुरुआती जीवन और शिक्षा
जगदीप धनखड़ का जन्म 18 मई 1951 को राजस्थान के झुंझुनू जिले के किथाना गांव में एक साधारण किसान परिवार में हुआ. वे एक ‘किसान पुत्र’ के रूप में जाने जाते हैं. अपनी प्रारंभिक शिक्षा गांव के स्कूल से पूरी करने के बाद, उन्होंने चित्तौड़गढ़ सैनिक स्कूल में स्कॉलरशिप पर पढ़ाई की. नेशनल डिफेंस एकेडमी में उनका चयन हुआ, लेकिन उन्होंने उच्च शिक्षा को प्राथमिकता दी. उन्होंने जयपुर के महाराजा कॉलेज से बीएससी (ऑनर्स) और राजस्थान विश्वविद्यालय से विधि की डिग्री प्राप्त की.

कानूनी करियर की मजबूत नींव
जगदीप धनखड़ (Jagdeep Dhankhar) ने जयपुर में वकालत शुरू की और जल्द ही राजस्थान हाई कोर्ट के एक प्रतिष्ठित वकील के रूप में पहचान बनाई. 1979 में उन्होंने राजस्थान बार काउंसिल की सदस्यता ली और 27 मार्च 1990 को वरिष्ठ अधिवक्ता बने. वे सुप्रीम कोर्ट में भी प्रैक्टिस करते रहे और 1987 में राजस्थान हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष चुने गए. उनकी कानूनी विशेषज्ञता ने उनके राजनीतिक करियर की नींव रखी.
देवीलाल के कारण हुई राजनीति में प्रविष्टि
जगदीप धनखड़ (Jagdeep Dhankhar) की राजनीति में एंट्री चौधरी देवीलाल के प्रभाव से हुई, जिनसे वे काफी प्रभावित थे. 1989 में देवीलाल के 75वें जन्मदिन पर धनखड़ ने 75 गाड़ियों का काफिला लेकर दिल्ली पहुंचे. उसी वर्ष लोकसभा चुनाव में जनता दल ने उन्हें झुंझुनू से टिकट दिया, और वे 9वीं लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए. 1990-91 में वे चंद्रशेखर सरकार में संसदीय कार्य राज्यमंत्री बने. 1993-98 तक वे राजस्थान विधानसभा में किशनगढ़ से विधायक रहे.

राज्यपाल और उपराष्ट्रपति पद पर होना
जुलाई 2019 से जुलाई 2022 तक जगदीप धनखड़ (Jagdeep Dhankhar) पश्चिम बंगाल के राज्यपाल रहे, जहां उनकी तृणमूल कांग्रेस सरकार के साथ तनातनी रही. 16 जुलाई 2022 को एनडीए ने उन्हें उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार घोषित किया. 6 अगस्त 2022 को हुए चुनाव में उन्होंने मार्गरेट अल्वा को 528-182 वोटों से हराया और 11 अगस्त 2022 को 14वें उपराष्ट्रपति के रूप में शपथ ली. राज्यसभा के सभापति के रूप में उन्होंने संसदीय मर्यादा और नारी शक्ति वंदन विधेयक जैसे मुद्दों पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
तीसरे उपराष्ट्रपति, जिनका कार्यकाल अधूरा रहा
जगदीप धनखड़ (Jagdeep Dhankhar) का कार्यकाल 2027 तक था, लेकिन 21 जुलाई 2025 की देर शाम उन्होंने स्वास्थ्य कारणों से इस्तीफा दे दिया. संविधान के अनुच्छेद 67(ए) के तहत उन्होंने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को त्यागपत्र सौंपा. इससे पहले कृष्ण कांत (1997-2002) का निधन और वीवी गिरि (1969) का इस्तीफा भी कार्यकाल अधूरा छोड़ गया था. धनखड़ ने अपने पत्र में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, और संसद सदस्यों के सहयोग के लिए आभार जताया.

बिहार चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा इस्तीफा
राजनीति के जानकार मान रहे हैं कि जगदीप धनखड़ (Jagdeep Dhankhar) की विदाई देश की राजनीति में एक बड़ा बदलाव ला सकती है. उनके कार्यकाल में भारत की आर्थिक प्रगति और वैश्विक उभार को देखने का उन्हें गर्व था. जेल सुधार, आयुर्वेद, और संसदीय प्रणाली पर उनके विचार उनकी विरासत का हिस्सा हैं. उनका अचानक इस्तीफा राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है. कई विद्वान तो इसे बिहार विधानसभा चुनाव से भी जोड़कर देख रहे हैं.
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