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कच्चे मकान में ‘डिजिटल इंडिया’! हजारीबाग में आजादी के 78 साल बाद भी मिट्टी के मकान में चल रहा है डाकघर

Hazaribagh Mud House Post Office: झारखंड के हजारीबाग जिले के टाटीझरिया प्रखंड में परटंगा डाकघर आज भी आजादी के 78 साल बाद मिट्टी के कच्चे मकान से चल रहा है. बरसात में दस्तावेज भीग रहे हैं, ग्रामीण डिजिटल सुविधाओं और पक्के भवन की मांग कर रहे हैं.

Jharkhand Hazaribagh Partanga Post Office Operating from Mud House Post Independence Digital India Reality

Hazaribagh Mud House Post Office: हजारीबाग/जितेंद्र कुमार: जब हम 21वीं सदी के आधुनिक भारत और ‘ई-गवर्नेंस’ की तस्वीरें देखते हैं, तो देश के सुदूर ग्रामीण अंचलों की कुछ तस्वीरें हमें ठहरकर सोचने पर मजबूर कर देती हैं. झारखंड के हजारीबाग जिले से एक ऐसी ही चौंकाने वाली हकीकत सामने आई है. जिला मुख्यालय से दूर टाटीझरिया प्रखंड की परटंगा (पतंग) पंचायत में एक ऐसा डाकघर (Post Office) है, जो आजादी के 78 साल बीत जाने के बाद भी एक अदद पक्के भवन को तरस रहा है. यह डाकघर आज भी मिट्टी की जर्जर दीवारों और खपरैल वाली कच्ची छत के नीचे सांसें ले रहा है.

कहने को तो देश को स्वतंत्र हुए सात दशक से ज्यादा का वक्त हो चुका है, लेकिन इस सुदूरवर्ती इलाके के लिए समय जैसे ठहर सा गया है. महज़ 10 बाय 10 के एक बेहद छोटे और अंधेरे कमरे से संचालित होने वाला यह परटंगा डाकघर दरअसल आजादी से पहले (ब्रिटिश काल) से ही इस इलाके की सेवा में कार्यरत है.

भीग जाते हैं सरकारी दस्तावेज (Monsoon Struggle of Partanga Post Office)

इस डाकघर की सबसे दर्दनाक कहानी मानसून के दिनों में लिखी जाती है. डाकघर के परटंगा ब्रांच पोस्ट मास्टर (BPM) अनिल मुर्मू और वहां कार्यरत कर्मचारी बताते हैं कि बरसात के मौसम में खपरैल की छत से लगातार पानी टपकता है. कई बार स्थिति इतनी खराब हो जाती है कि ग्रामीणों की पासबुक, सरकारी रजिस्टर और महत्वपूर्ण दस्तावेज पानी में भीगकर खराब हो चुके हैं.

कर्मचारियों को अपनी ड्यूटी निभाने से ज्यादा चिंता इस बात की रहती है कि वे सरकारी रिकॉर्ड को पानी से कैसे बचाएं. इसके बावजूद, इसी जर्जर व्यवस्था के बीच कर्मचारी गांव-गांव जाकर केंद्र सरकार की ‘सुकन्या समृद्धि योजना’ और अन्य बचत स्कीमों का प्रचार कर रहे हैं, जिससे ग्रामीणों में जागरूकता भी बढ़ रही है.

10×10 के कमरे की उम्मीदें (Rural Financial Dependency on Post Office)

भले ही इस इमारत की दीवारें मिट्टी की हों और छत से पानी टपकता हो, लेकिन स्थानीय ग्रामीणों के लिए यह वित्तीय सुरक्षा का सबसे बड़ा केंद्र है. आज भी परटंगा और आसपास के सैकड़ों ग्रामीण अपनी गाढ़ी कमाई की आरडी (रिकरिंग डिपॉजिट), सुकन्या योजना और अन्य बचत खातों का पैसा जमा करने के लिए इसी 10 बाय 10 के कमरे पर निर्भर हैं. स्थानीय ग्रामीण महिलाओं का कहना है कि जब वे यहां पैसे जमा करने आती हैं, तो इसकी जर्जर हालत देखकर हमेशा डर लगा रहता है. तकनीक के इस दौर में यहां आधुनिक और डिजिटल सुविधाएं ऊंट के मुंह में जीरा जैसी हैं.

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कब बदलेगी परटंगा डाकघर की सूरत? (Public Demand for Post Office)

इस गंभीर मामले पर स्थानीय लोगों ने जिला प्रशासन और डाक अधीक्षक निरंजन कुमार से परटंगा डाकघर के लिए तुरंत एक नया पक्का भवन और आधुनिक डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर उपलब्ध कराने की मांग की है. ग्रामीणों का कहना है कि सुदूर क्षेत्रों में बैंकिंग सेवाओं का एकमात्र सहारा यही डाकघर है, इसलिए इसे सिर्फ कागजों पर डिजिटल बनाने के बजाय जमीन पर भी मजबूत किया जाए. अब देखना यह है कि डाक विभाग के आला अधिकारी कब इस आजादी से पहले के ऐतिहासिक डाकघर की सुध लेते हैं और कब इस मिट्टी के मकान को पक्की छत नसीब होती है.



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