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जमीयत उलमा-ए-हिंद ने वक्फ संशोधन कानून को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दी चुनौती

मौलाना अरशद मदनी ने कहा, ‘हमें न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है. जैसे अन्य मामलों में न्याय हुआ है, वैसे ही इस संवेदनशील और असंवैधानिक कानून पर भी हमें न्याय मिलेगा.

नई दिल्ली के व्यस्त अदालत परिसर में, जहाँ हर दिन लाखों फैसले होते हैं, एक नई कहानी शुरू हो रही है —न्याय, संविधान, और धार्मिक स्वतंत्रता के लिए एक लड़ाई. यह कहानी है जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी और उनकी टीम की, जिन्होंने वक्फ संशोधन कानून 2025 के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया.

मौलाना अरशद मदनी का दृढ़ निश्चय

मौलाना अरशद मदनी, एक सशक्त नेता और धार्मिक स्वतंत्रता के दृढ़ समर्थक, संसद के इस कानून के खिलाफ खड़े हुए, जिसे वे भारतीय संविधान के मूल सिद्धांतों के खिलाफ मानते थे. उनका दावा था कि यह कानून मुसलमानों की धार्मिक स्वतंत्रता छीनने की साजिश है और यह संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 16, 25, 26, और 300A का उल्लंघन करता है.

सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करना

जब यह याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई, तो कोर्ट के दरवाजे जैसे न्याय के लिए खुले थे. याचिका में न सिर्फ इस कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी, बल्कि केंद्र सरकार को नोटिफिकेशन जारी करने से रोकने के लिए अंतरिम आदेश की भी मांग की गई थी.

मुख्य आपत्तियाँ:
वक्फ बाय यूजर की प्रक्रिया को समाप्त करने पर आपत्ति.

वक्फ बोर्ड में मुस्लिम मुख्य कार्यकारी अधिकारी की अनिवार्यता को हटाए जाने पर सवाल उठाना.

संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 16, 25, 26, और 300A का उल्लंघन.

लोकों और सांसदों का समर्थन

कोर्ट के भीतर तनाव था, लेकिन मौलाना अरशद मदनी का आत्मविश्वास अडिग था. उन्होंने कहा, “हमें न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है. जैसे अन्य मामलों में न्याय हुआ है, वैसे ही इस संवेदनशील और असंवैधानिक कानून पर भी हमें न्याय मिलेगा.” बाहर, न्यायप्रिय नागरिक और सेक्युलर सांसद इस मुद्दे पर आवाज़ बुलंद कर रहे थे. उन्होंने रातभर संसद में डटे रहकर इस कानून के संभावित दुष्परिणामों को उजागर किया. यह लोकतंत्र की ताकत थी—जब लोग अपने अधिकारों के लिए खड़े होते हैं. जैसे-जैसे मामला आगे बढ़ा, सुप्रीम कोर्ट ने इसकी सुनवाई के लिए तारीख तय की. यह लड़ाई सिर्फ एक कानून के खिलाफ नहीं थी, बल्कि भारतीय संविधान की आत्मा के लिए थी.

क्या न्याय मिलेगा? यह सवाल अब पूरे देश के मन में गूंज रहा था. लेकिन एक बात पक्की थी—यह कहानी न्याय, साहस, और संविधान की रक्षा के लिए एक प्रेरणा बनकर हमेशा याद रखी जाएगी.

ये भी पढ़े Waqf Bill: सुप्रीम कोर्ट ने वक्फ कानून की चुनौती पर सुनवाई के लिए दी सहमति

-भारत एक्सप्रेस 



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