Chhattisgarh News/Deepak: छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो सिस्टम के दावों की पोल खोलने के लिए काफी है. कहने को तो सरकार आदिवासियों के उत्थान के लिए करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा रही है, लेकिन जमीनी हकीकत देख कर आपका कलेजा कांप जाएगा. कोरिया के कटघोड़ी स्थित आदिवासी बालक प्री-मैट्रिक छात्रावास में रहने वाले छात्र किसी सुरक्षित छत के नीचे नहीं, बल्कि डर के साये में जीने को मजबूर हैं.
करोड़ों का भवन, पर रहने को जगह नहीं
हैरानी की बात यह है कि जिस छात्रावास भवन को बनाने में सरकार ने करीब 1 करोड़ 74 लाख रुपये खर्च कर दिए, उसकी हालत आज किसी खंडहर से कम नहीं है. अभी भवन को बने ज़्यादा वक्त भी नहीं बीता और दीवारों से लेकर छत तक में बड़ी-बड़ी दरारें आ गई हैं. इन दरारों को देखकर साफ पता चलता है कि निर्माण के वक्त गुणवत्ता के साथ किस कदर खिलवाड़ किया गया होगा. भ्रष्टाचार की ईंटों पर खड़ी यह इमारत कभी भी किसी बड़े हादसे को न्योता दे सकती है.
खुले में नहाने को मजबूर मासूम छात्र
छात्रावास के भीतर की स्थिति और भी बदतर है. बाथरूम इतने जर्जर हो चुके हैं कि वहां जाना खतरे से खाली नहीं है. नतीजा यह है कि यहां रहने वाले आदिवासी बच्चे साल के 12 महीने कड़कड़ाती ठंड हो या चिलचिलाती धूप, छात्रावास के बाहर एक पाइप के सहारे खुले में नहाने और कपड़े धोने को मजबूर हैं. उनकी निजता और गरिमा का यहां कोई मोल नहीं रह गया है.
सिर्फ बाथरूम ही नहीं, कमरों के बिजली बोर्ड तक टूटे हुए हैं. नंगे तार और लटकते स्विच बोर्ड मासूम बच्चों के लिए मौत का जाल बने हुए हैं. सुरक्षा के नाम पर पूरे परिसर में एक अदद गेट तक नहीं है, जिससे रात के वक्त जंगली जानवरों या बाहरी तत्वों का खतरा हमेशा बना रहता है.
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अफसरों का वही पुराना राग
जब यह मामला मीडिया के जरिए सामने आया, तो हमेशा की तरह आदिवासी विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों ने ‘जांच’ और ‘व्यवस्था सुधारने’ का रटा-रटाया जवाब दे दिया है. पर सवाल यह है कि जब करोड़ों रुपये खर्च हो रहे थे, तब ये जिम्मेदार एजेंसियां कहां सो रही थीं? क्या उन ठेकेदारों पर कार्रवाई होगी जिन्होंने बच्चों की जिंदगी को दांव पर लगाकर अपनी जेबें भरीं?
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-भारत एक्सप्रेस
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