Mamata Banerjee 2026 Election: पश्चिम बंगाल की राजनीति में साल 2011 वो ऐतिहासिक मोड़ था, जब ममता बनर्जी ने 34 साल से सत्ता पर काबिज लेफ्ट सरकार को हटाकर राजनीतिक दशा और दिशा बदल दी. इसकी कहानी सिंगूर के उस आंदोलन से शुरू होता है, जिसकी वजह से पश्चिम बंगाल की राजनीति हमेशा के लिए बदल गई.
साल 2006 में टाटा मोटर्स ने दुनिया की सबसे सस्ती कार TATA Nano बनाने के लिए एक नया प्लांट लगाने का फैसला किया. उस समय पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा की सरकार थी, जिसकी कमान बुद्धदेव भट्टाचार्य के हाथों में थी. बुद्धदेव भट्टाचार्य ने टाटा मोटर्स को पश्चिम बंगाल के सिंगूर में नैनो प्लांट लगाने के लिए आमंत्रित किया. उन्होंने इसके लिए वहां पर 997 एकड़ जमीन अधिग्रहित की. उस समय कांग्रेस विपक्ष में थी.
सरकार की इस कार्रवाई का किसानों ने विरोध किया. किसानों का कहना था कि सरकार ने यह जमीन उनसे जबरन छीनी है और उन्हें उचित मुआवजा भी नहीं दिया गया.
किसानों के विरोध को देखते हुए कांग्रेस वाम सरकार के विरोध में उतर आई. विपक्षी नेता ममता बनर्जी ने किसानों के समर्थन में आंदोलन शुरू कर दिया. इस आंदोलन में ममता बनर्जी ने 26 दिन का अनशन किया. उस समय बीजेपी नेता राजनाथ सिंह और पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह समेत कई नेताओं ने ममता बनर्जी के साथ मुलाकात की और उनके साथ एकजुटता दिखाई.

सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलन से मिली ‘दीदी’ की पहचान
ममता बनर्जी का असली राजनीतिक उभार सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलन से ही शुरू हुआ था. 14 मार्च 2007 को नंदीग्राम में जमीन अधिग्रहण करने की कोशिश के दौरान पुलिस ने किसानों पर फायरिंग कर दी. इस फायरिंग में 14 लोगों की मौत हो गई. नवंबर 2007 में एक बार फिर पुलिस ने जमीन अधिग्रहण की कोशिश की. जिसका विरोध करने पर दोबारा गोलीबारी हुई और कई लोग मारे गए, वहीं 7 ग्रामीण लापता हो गए.
नंदीग्राम में हुई फायरिंग और सिंगूर में ममता बनर्जी के भूख हड़ताल ने भट्टाचार्य सरकार की छवि खराब कर दी. 2 अक्टूबर 2008 में रतन टाटा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सिंगूर परियोजना को पश्चिम बंगाल से बाहर ले जाने का ऐलान किया, लेकिन तबतक बहुत देर हो चुकी थी. जिसकी कीमत बुद्धदेव भट्टाचार्य को अगले विधानसभा चुनाव में चुकानी पड़ी.

साल 2011 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस के गठबंधन ने ऐतिहासिक जीत दर्ज करते हुए राज्य की राजनीति में बड़ा बदलाव कर दिया. गठबंधन ने कुल 227 सीटों पर विजय हासिल की, जिनमें से 184 सीटों पर तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार विजयी रहे.
इस परिणाम के साथ ही ममता बनर्जी ने 34 वर्षों से सत्ता में काबिज वाम मोर्चा सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया, जिसे राज्य की राजनीति में एक युगांतकारी बदलाव माना गया. इस जीत के बाद 20 मई 2011 को ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल की पहली महिला मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली.
राजनीतिक विश्लेषकों और मीडिया ने इस जनादेश को राजनीतिक क्रांति करार दिया, क्योंकि लंबे समय से चले आ रहे वाम शासन का अंत होना भारतीय राजनीति की बड़ी घटनाओं में गिना गया. चुनाव प्रचार के दौरान ममता बनर्जी ने खुद को “मां-माटी-मानुष” की नेता बताते हुए जनता से सीधा जुड़ाव बनाने की रणनीति अपनाई थी, जो चुनावी जीत का बड़ा आधार साबित हुई.

साल 2016 की जीत और विवाद शुरू
पश्चिम बंगाल में साल 2016 हुए विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने दोबारा लैंडस्लाइड विक्ट्री की. TMC ने 295 में से 211 सीटों पर जीतकर प्रचंड बहुमत के साथ दोबारा सरकार बनाई, लेकिन इसी दौर में सरकार पर भ्रष्टाचार और हिंसा सहित कई आरोप भी लगने शुरू हो गए. जिसमें चिटफंड घोटाला, राजनीतिक हिंसा को बढ़ावा देना मुख्य रूप से शामिल है.
इसी बीच साल 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने जबरदस्त एंट्री की. भाजपा ने लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में हिंदुत्व, राष्ट्रीय सुरक्षा और भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर ममता बनर्जी को जबरदस्त चुनौती दी और 18 सीटें जीत ली. यह ममता बनर्जी के लिए एक बड़ा सेटबैक था.
इसी बीच राजनीतिक हत्याओं ने ममता बनर्जी को काफी मुश्किलें पैदा कर दी. एनसीआरबी के अनुसार 1999 से 2016 के बीच पश्चिम बंगाल में हर साल औसतन 20 राजनीतिक हत्याएं हुईं. एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक 2019 के लोकसभा चुनावों के बाद से टीएमसी और भाजपा कार्यकर्ताओं को मिलाकर कुल 47 राजनीतिक हत्याएं हुई हैं, जिनमें से 38 दक्षिण बंगाल में हुई हैं.
ये भी पढ़ें- ‘बस 11 विधायक दे दो, फिर होगा एनकाउंटर…’ ‘ईद मिलन’ के कार्यक्रम में AIMIM नेता शौकत अली के जहरीले बोल
साल 2021 में ममता बनर्जी की दमदार वापसी
2019 के लोकसभा चुनाव के बाद ममता बनर्जी लगातार बीजेपी के निशाने पर रहीं. साल 2021 का विधानसभा चुनाव ममता बनर्जी के लिए सबसे बड़ा परीक्षा था. बीजेपी ने इस चुनाव में पूरी ताकत लगा दी. इस चुनाव में पीएम मोदी, गृहमंत्री अमित शाह ने जबरदस्त रैलियां की. इसके बावजूद ममता बनर्जी ने इस चुनाव में भारी जीत दर्ज की और तीसरी बार मुख्यमंत्री बनीं. हालांकि इस चुनाव में ममता बनर्जी खुद नंदीग्राम सीट हार गईं. ममता को बीजेपी के सुवेंदु अधिकारी ने 1956 वोटों से हराया, लेकिन फिर उपचुनाव में जीत दर्ज कर विधानसभा पहुंची.
क्या है ममता की ताकत?
ममता बनर्जी की ताकत के पीछे तीन योजनाएं और तीन फैक्टर्स को मुख्य वजह बताई जाती हैं. योजनाओं में युवा साथी, लक्ष्मी भंडार और स्वास्थ्य साथी. इन योजनाओं के माध्यम से ममता बनर्जी महिला, बुजुर्ग और युवा तीनों वर्गों को एक साथ साध लेती हैं.
ममता बनर्जी का महिलाओं पर अच्छी पकड़ मानी जाती है. हालांकि आरजी कर मेडिकल कॉलेज रेप कांड मामले से उनकी छवि को थोड़ा नुकसान हुआ है, लेकिन अभी भी ममता बनर्जी का महिलाओं पर अच्छी पकड़ है.
15 साल बाद क्या ममता का दौर जारी रहेगा?
साल 2011 से 2026 तक ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल की राजनीति पर पूरी पकड़ बनाए रखी हैं, लेकिन हाल के कई मामलों ने ममता बनर्जी की छवि को काफी नुकसान पहुंचाया है. जिसमें टीचर घोटाला और घुसपैठ का मामला काफी बड़ा है. बीजेपी लगातार यह आरोप लगाती रही है कि पश्चिम बंगाल में अवैध घुसपैठियों पर राज्य सरकार सख्ती नहीं दिखा रही. सीमा से लगे जिलों में जनसंख्या संतुलन बदलने के आरोप भी लगाए गए हैं, जिसे लेकर केंद्र और राज्य के बीच टकराव की स्थिति कई बार बनी.
ये भी पढ़ें- आसिया अंद्राबी को UAPA केस में हुई उम्रकैद, स्पेशल कोर्ट ने देश के विरुद्ध युद्ध छेड़ने की साजिश रचने का दोषी माना
साल 2011 से शुरू हुआ ममता बनर्जी का दौर अब अपने सबसे कठिन राजनीतिक दौर में पहुंच चुका है. एक तरफ लगातार चुनाव जीतने का रिकॉर्ड है, तो दूसरी तरफ घोटालों, घुसपैठ और प्रशासनिक फैसलों को लेकर बढ़ती आलोचना ममता बनर्जी के लिए सिरदर्द बन चुकी है. इस साल होने वाले विधानसभा चुनाव यह तय करेंगे कि ममता बनर्जी की पकड़ पहले जैसी मजबूत रहती है या पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर बदलाव की ओर बढ़ती है.
-भारत एक्सप्रेस
इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.

