बिहार की राजनीति में अगर कोई एक चेहरा है जो पिछले कई दशकों से सत्ता के केंद्र में रहा है, तो वह हैं नीतीश कुमार. अब गलियारों में चर्चा जोरों पर है कि बिहार के ‘सुशासन बाबू’ यानी नीतीश कुमार जल्द ही राज्यसभा का रुख कर सकते हैं. यह खबर न सिर्फ उनके समर्थकों के लिए, बल्कि उनके विरोधियों के लिए भी एक बड़े राजनीतिक बदलाव का संकेत है. आखिर एक ऐसा नेता, जिसने बिहार की सत्ता पर अपनी पकड़ इतनी मजबूती से बनाए रखी हो, उसका राज्यसभा जाना क्या महज एक बदलाव है या कोई बड़ा मास्टरस्ट्रोक?
संघर्ष से सत्ता के शिखर तक का सफर
नीतीश कुमार का राजनीतिक सफर काफी लंबा रहा है रहा है. 1985 में निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर शुरुआत करने वाले एक युवा नेता ने सोचा भी नहीं होगा कि वह एक दिन बिहार की राजनीति के सबसे लंबे और चर्चित अध्याय बन जाएंगे.1987 में युवा लेक दल के अध्यक्ष बने. फिर 1989 में पहली बार लोकसभा पहुंचे और 1994 में जॉर्ज फर्नांडीस के साथ मिलकर समता पार्टी की नींव रखी. ये उनके करियर का वह मोड़ था जिसने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई.
इसके बाद नीतीश साल 1996 में एक बार फिर लोक सभा पहुंचे और अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में रेल मंत्री बने. रैल मंत्री के तौर पर उनके काम को आज भी याद किया जाता है. लेकिन, उनका असली ‘होम ग्राउंड’ तो बिहार ही रहा. 2000 में पहली बार मुख्यमंत्री पद की कुर्सी संभालने से लेकर आज तक, उन्होंने सत्ता के उतार-चढ़ाव को इतनी करीब से देखा है कि राजनीति के जानकार उन्हें ‘राजनीति का जादूगर’ कहने से नहीं हिचकते.
10 बार मुख्यमंत्री: एबेमिसाल रिकॉर्ड
यह कोई छोटी बात नहीं है कि एक ही राज्य में कोई नेता 10 बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ले. बिहार की राजनीति की यही खूबी है, और नीतीश कुमार ने इस खेल को बखूबी समझा है. एनडीए हो या महागठबंधन, सत्ता के समीकरण चाहे जैसे भी बदले हों, मुख्यमंत्री की कुर्सी पर अक्सर नीतीश कुमार ही विराजमान रहे. 2005 के ‘सुशासन’ के वादे से लेकर 2025 में 10वीं बार शपथ लेने तक, उनका सफर बिहार के बदलते मिजाज की कहानी बयां करता है.
अब राज्यसभा
राजनीतिक विश्लेषक मान रहे हैं कि अगर नीतीश कुमार राज्यसभा जाते हैं, तो यह बिहार में एक बड़े ‘पावर शिफ्ट’ की शुरुआत हो सकती है. सवाल यह है कि अगर वे दिल्ली की राजनीति में सक्रिय होते हैं, तो पटना की बागडोर किसके हाथों में होगी? क्या यह जेडीयू और बीजेपी के बीच के शक्ति संतुलन को और पुख्ता करने की कोशिश है, या फिर यह नीतीश कुमार की राष्ट्रीय राजनीति में कोई नई भूमिका तलाशने की कवायद है?
नीतीश कुमार का हर कदम बेहद सोच-समझकर उठाया गया होता है. वे समय की नब्ज पहचानने में माहिर रहे हैं. ऐसे में राज्यसभा जाने की उनकी यह चर्चा महज खबरों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बिहार के भविष्य की दिशा तय करने वाला एक बड़ा कदम हो सकता है.
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-भारत एक्सप्रेस
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