रियलिटी चेक में खुला बसों का सच
रिपोर्ट- मुकेश कुमार/दिल्ली
Private Bus Safety Issues: नोएडा एक्सप्रेसवे पर बिहार जा रही एक लग्जरी प्राइवेट बस में अचानक आग लग गई. इस भीषण हादसे में कई यात्रियों की जान चली गई और कई लोग गंभीर रूप से घायल हो गए. इस घटना के बाद एक बार फिर लंबी दूरी तय करने वाली प्राइवेट बसों की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठने लगे हैं. क्या इन बसों में सफर करना सच में सुरक्षित है, इसी हकीकत को जानने के लिए भारत एक्सप्रेस की टीम ने दिल्ली के आनंद विहार इलाके में रियलिटी चेक किया.
आनंद विहार से रोजाना हजारों लोग भरते हैं बिहार यूपी की बस
आनंद विहार दिल्ली का वो बड़ा सेंटर है जहां से हर दिन हजारों यात्री बिहार, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और नेपाल के लिए निकलते हैं. सरकारी बस अड्डे के ठीक सामने सड़क पर प्राइवेट बस ऑपरेटरों की लंबी लाइन लगी रहती है. लोग मजबूरी में इन बसों में महंगा टिकट लेकर सफर करते हैं. क्या इन बसों में सुरक्षा के पूरे इंतजाम हैं, जब हमारी टीम अंदर पहुंची तो तस्वीरें चौंकाने वाली थीं?
बस के अंदर डेढ़ फीट की सकरी गली
हमने जब एक स्लीपर बस के अंदर की वीडियोग्राफी किया गया तो देखा कि एक साइड में दो लोगों की बर्थ बनी है और दूसरी साइड में एक आदमी के सोने की जगह है. बीच में जो आने जाने का रास्ता है वो मुश्किल से डेढ़ फुट का है. इसी संकरे रास्ते से पूरी बस के 40 से 50 यात्रियों को निकलना होता है. अब सोचिए अगर चलते चलते बस में धुआं भर जाए या आग लग जाए तो इतनी कम जगह से लोग कैसे बाहर आएंगे? भगदड़ में तो और बुरा हाल होगा.
बस की छत पर मोटरसाइकिल से लेकर बोरियां तक लदी
सिर्फ अंदर ही नहीं, बस के ऊपर भी लापरवाही दिखी. लगभग हर बस की छत पर जरूरत से ज्यादा सामान ठूंस ठूंस कर भरा था. किसी बस पर बाइक बांधी हुई थी, किसी पर बड़े बड़े कार्टन और प्लास्टिक की बोरियां लदी थीं. बस वाले यात्रियों से लगेज के नाम पर अलग से पैसा वसूलते हैं और फिर छत पर ओवरलोडिंग कर देते हैं. ज्यादा वजन से बस का बैलेंस बिगड़ता है और पलटने का खतरा बढ़ता है. नियम कहता है छत पर इतना सामान नहीं ले जा सकते, पर यहां कोई देखने वाला नहीं.
इमरजेंसी खिड़की पर सामान और तार से बंधा गेट
किसी भी बस में इमरजेंसी एग्जिट सबसे ज्यादा जरूरी होता है, यही हादसे के वक्त जान बचाता है. आनंद विहार में खड़ी कई बसों में इमरजेंसी खिड़की के सामने ही कंबल और बैग रखे मिले. कुछ बसों में तो इमरजेंसी गेट को लोहे के तार से बांधा हुआ था. यानी इमरजेंसी में भी यात्री उसे खोल नहीं पाएगा. अगर आग लग गई तो यही छोटी लापरवाही बड़ी मौत की वजह बन जाएगी.
फायर सिलेंडर एक्सपायर, टायर घिसकर गंजे
सुरक्षा उपकरणों की भी जांच की गई तो हालात और खराब मिले. कुछ बसों में फायर एक्सटिंग्विशर लगा तो था लेकिन उस पर धूल जमी थी और उसकी एक्सपायरी डेट साल भर पहले निकल चुकी थी. ड्राइवर को ये भी नहीं पता था कि उसे चलाते कैसे हैं? फर्स्ट एड बॉक्स तो ज्यादातर बसों से गायब था. टायरों की हालत तो सबसे ज्यादा खतरनाक थी, कई टायर पूरी तरह घिस चुके थे. ऐसे गंजे टायर हाईवे पर गर्म होकर कभी भी फट सकते हैं.
पूरा किराया वसूली, सुविधा के नाम पर कुछ नहीं
इन प्राइवेट बसों का किराया बहुत ज्यादा होता है. आम दिनों में बिहार का टिकट 1500 से 2000 रुपये और छठ दिवाली पर 4000 रुपये तक पहुंच जाता है. इतना पैसा लेने के बाद भी यात्री को सुरक्षा नहीं मिलती. ट्रेन और फ्लाइट में बीमा और मुआवजे का नियम साफ होता है लेकिन बस ऑपरेटर कभी नहीं बताता कि टिकट में इंश्योरेंस शामिल है या नहीं. हादसा होने पर कौन जिम्मेदार होगा, इसका कोई जवाब नहीं देता.ॉ
ये भी पढ़ें-MMDR संशोधन बिल पर JMM के ‘ऐतिहासिक आंदोलन’ का क्या हुआ? BJP प्रवक्ता ने कसा तंज
क्या हादसे के बाद ही जागेगा प्रशासन?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि इन बसों की चेकिंग कौन करेगा? आरटीओ और ट्रांसपोर्ट विभाग सिर्फ कागज पर फिटनेस पास कर देता है. सड़क पर दौड़ रही इन बसों को कोई नहीं रोकता. हर बार हादसा होता है, दो दिन शोर मचता है और फिर सब भूल जाते हैं. आनंद विहार से रोज हजारों गरीब मजदूर, छात्र और परिवार अपने घर जाते हैं. वो सिर्फ मंजिल तक नहीं, सुरक्षित घर पहुंचना चाहते हैं. जरूरत है कि सरकार इन प्राइवेट बसों की रोजाना सख्ती से जांच करे ताकि नोएडा जैसा हादसा फिर ना हो.
Also Follow Bharat Express on Youtube
-भारत एक्सप्रेस
इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.



