जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला एक बार फिर सुर्खियों में हैं, लेकिन इस बार वजह राजनीति नहीं बल्कि उनकी निजी जिंदगी है. उमर अब्दुल्ला ने वरिष्ठ पत्रकार निधि राजदान के साथ विवाह कर अपने जीवन का नया अध्याय शुरू किया है. दोनों ने 30 अक्टूबर 2026 को शादी की, जबकि 31 अक्टूबर को सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों को इसकी जानकारी दी. यह विवाह स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत संपन्न हुआ है.
कौन हैं निधि राजदान?
निधि राजदान देश की जानी-मानी पत्रकार और टीवी एंकर रही हैं. दूसरी ओर, उमर अब्दुल्ला की पहली शादी वर्ष 1994 में पायल नाथ से हुई थी. इस विवाह से उनके दो बेटे हैं. हालांकि, लंबे समय से दोनों अलग रह रहे थे और आखिरकार जुलाई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने उनके वैवाहिक संबंध को कानूनी रूप से समाप्त कर दिया.
अब्दुल्ला परिवार में पहले भी हुए हैं ऐसे रिश्ते
अब्दुल्ला परिवार के लिए अलग समुदायों और पृष्ठभूमियों में विवाह कोई नई बात नहीं है. उमर अब्दुल्ला की बहन सारा अब्दुल्ला ने कांग्रेस नेता सचिन पायलट से शादी की थी, हालांकि दोनों का साल 2023 में तलाक हो गया. वहीं उमर के पिता फारूक अब्दुल्ला की पत्नी मॉली का जन्म ब्रिटेन में हुआ था. इससे साफ है कि परिवार में रिश्तों को धर्म और समुदाय की सीमाओं से परे भी स्वीकार किया जाता रहा है.
सिर्फ राजनीति नहीं, बॉलीवुड में भी कई उदाहरण
ऐसे रिश्तों के उदाहरण केवल राजनीतिक परिवारों तक सीमित नहीं हैं. मनोरंजन जगत में भी कई चर्चित शादियां अलग-अलग धर्मों और समुदायों के लोगों के बीच हुई हैं. सैफ अली खान और करीना कपूर इसका प्रमुख उदाहरण हैं. वहीं आमिर खान की बेटी इरा खान ने नूपुर शिखरे से विवाह किया. अभिनेत्री सोहा अली खान ने भी कुणाल खेमू को अपना जीवनसाथी चुना.
तब समाज का नजरिया क्यों बदल जाता है?
यहीं से एक बड़ा सामाजिक सवाल खड़ा होता है. जब किसी प्रभावशाली, संपन्न या चर्चित परिवार का बेटा-बेटी अपनी पसंद से शादी करता है, तो उसे व्यक्तिगत निर्णय बताकर स्वीकार कर लिया जाता है. लेकिन जब यही कदम किसी साधारण या आर्थिक रूप से कमजोर परिवार का युवक-युवती उठाता है, तो कई बार उन्हें विरोध, सामाजिक दबाव और यहां तक कि धमकियों का सामना करना पड़ता है.
अंतरजातीय विवाह पर अब भी होते हैं विवाद
देश के कई राज्यों में समय-समय पर अंतरजातीय और अंतरधार्मिक विवाह को लेकर विवाद सामने आते रहे हैं. कई मामलों में परिवार और समाज की असहमति इतनी बढ़ जाती है कि मामला कानूनी और सामाजिक संघर्ष तक पहुंच जाता है. ऐसे में बहस केवल धर्म या जाति तक सीमित नहीं रहती, बल्कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता और समान अधिकारों के सवाल भी सामने आते हैं.
अमीरों के लिए स्वीकृति, गरीबों के लिए विरोध?
सामाजिक व्यवस्था पर सवाल उठाने वाली एक बड़ी बात यह भी है कि यदि कोई व्यक्ति धनवान, राजनीतिक रूप से प्रभावशाली या किसी ऊंचे पद पर है, तो उसके वैवाहिक फैसलों को अपेक्षाकृत आसानी से स्वीकार कर लिया जाता है. लेकिन जब यही फैसला किसी सामान्य परिवार का युवा लेता है, तो कई बार उसके लिए हालात मुश्किल हो जाते हैं. उत्तराखंड का एक उदाहरण अक्सर चर्चा में आता है, जहां एक दलित नेता के परिवार में ब्राह्मण बहू आने पर जश्न मनाया गया, जबकि इसी तरह का फैसला लेने वाले गरीब लोगों को विरोध और धमकियों का सामना करना पड़ा.
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संविधान और समाज के बीच का सवाल
आखिरकार सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या जीवनसाथी चुनने का अधिकार केवल कुछ विशेष वर्गों तक सीमित होना चाहिए? भारत का संविधान हर नागरिक को समानता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है. ऐसे में चाहे व्यक्ति अमीर हो या गरीब, नेता हो या आम नागरिक, उसे अपनी पसंद से शादी करने का समान अवसर और सम्मान मिलना चाहिए. यही वजह है कि उमर अब्दुल्ला और निधि राजदान की शादी के बहाने समाज के इस दोहरे नजरिए पर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है.
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