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पेपर लीक पर सियासी क्रेडिट वॉर! मोदी को घेरने उतरे राहुल-अखिलेश, केजरीवाल की पार्टी से क्यों बढ़ी तकरार?

Paper Leak Credit War: एक दिन पहले तक आंदोलन के केंद्र में वे छात्र थे, जिन्होंने सड़कों पर पुलिस की कार्रवाई का सामना किया. प्रदर्शन का नेतृत्व करने वाले संगठन और उसके पदाधिकारी भी चर्चा में थे. मगर अगले ही दिन तस्वीर बदल गई. छात्रों की चोटें, उनकी मांगें और आंदोलन की अगली रणनीति पीछे छूटती नजर आईं.

Paper Leak Credit War

Paper Leak Credit War

Paper Leak Credit War: पेपर लीक कोई मामूली राजनीतिक मुद्दा नहीं है. इसके पीछे लाखों छात्रों की मेहनत, परिवारों की उम्मीदें और वर्षों की तैयारी जुड़ी होती है. एक परीक्षा रद्द होती है तो सिर्फ प्रश्नपत्र नहीं बदलता, हजारों युवाओं की जिंदगी का कैलेंडर भी उलट जाता है. यही वजह है कि इस मुद्दे पर छात्रों का गुस्सा स्वाभाविक है. सवाल तब उठता है, जब छात्रों के आंदोलन के बीच राजनीतिक दल अपने-अपने झंडे लेकर उतर आते हैं और असली मुद्दे से ज्यादा चर्चा इस बात की होने लगती है कि सरकार को घेरने का श्रेय किसे मिलेगा.

एक दिन पहले तक आंदोलन के केंद्र में वे छात्र थे, जिन्होंने सड़कों पर पुलिस की कार्रवाई का सामना किया. प्रदर्शन का नेतृत्व करने वाले संगठन और उसके पदाधिकारी भी चर्चा में थे. मगर अगले ही दिन तस्वीर बदल गई. छात्रों की चोटें, उनकी मांगें और आंदोलन की अगली रणनीति पीछे छूटती नजर आईं. राजनीतिक मंच पर राहुल गांधी, अखिलेश यादव और अरविंद केजरीवाल की पार्टी आमने-सामने दिखाई देने लगीं.

विपक्षी दलों के बीच मानो यह साबित करने की होड़ शुरू हो गई कि युवाओं की आवाज सबसे पहले और सबसे मजबूती से किसने उठाई. पेपर लीक के खिलाफ शुरू हुआ आंदोलन अचानक राजनीतिक ‘क्रेडिट वॉर’ में बदलता नजर आया.

राहुल गांधी ने संभाला मोर्चा

राहुल गांधी शाम करीब चार बजे अपने समर्थकों और कांग्रेस नेताओं के साथ प्रधानमंत्री आवास के नजदीक धरने पर बैठ गए. उनके साथ कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, प्रियंका गांधी वाड्रा और पार्टी के कई वरिष्ठ नेता मौजूद थे. राहुल करीब ढाई घंटे तक जमीन पर बैठे रहे. पुलिस और सुरक्षाकर्मियों ने उनसे वहां से हटने की अपील की, लेकिन कांग्रेस नेता धरना जारी रखने पर अड़े रहे.

इसके बाद पुलिस ने राहुल गांधी समेत कांग्रेस नेताओं को हिरासत में लेकर बसों में बैठाया. कांग्रेस ने आरोप लगाया कि राहुल के साथ धक्का-मुक्की और बदसलूकी की गई. पार्टी नेताओं का कहना था कि नेता प्रतिपक्ष शांतिपूर्ण तरीके से छात्रों की मांग उठा रहे थे, लेकिन सरकार उनकी आवाज दबाना चाहती है.

कांग्रेस ने इस पूरे घटनाक्रम को छात्रों के अधिकारों की लड़ाई बताया. हालांकि राजनीतिक गलियारों में इसे राहुल गांधी की ओर से आंदोलन की कमान अपने हाथ में लेने की कोशिश के तौर पर भी देखा गया.

अखिलेश ने हिरासत को बनाया राजनीतिक संदेश

राहुल गांधी के धरने की खबर मिलते ही समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव भी मौके पर पहुंच गए. पुलिस ने उन्हें भी हिरासत में लेकर बस में बैठाया. लेकिन अखिलेश ने इस हिरासत को भी राजनीतिक संदेश में बदल दिया. बस में आगे बैठकर वह समर्थकों की ओर हाथ हिलाते दिखाई दिए. बाहर मौजूद कार्यकर्ताओं ने नारे लगाए और पूरा दृश्य किसी राजनीतिक रोड शो जैसा नजर आने लगा.

कांग्रेस जहां राहुल गांधी के साथ कथित दुर्व्यवहार का मुद्दा उठा रही थी, वहीं समाजवादी पार्टी के समर्थक अखिलेश की मौजूदगी को युवाओं के साथ खड़े होने के प्रमाण के तौर पर पेश कर रहे थे. इस तरह आंदोलन के भीतर ही यह मुकाबला शुरू हो गया कि विपक्ष का सबसे प्रभावशाली चेहरा कौन है.

केजरीवाल की पार्टी को क्यों हुई आपत्ति?

राहुल गांधी और अखिलेश यादव के मैदान में उतरने के बाद आम आदमी पार्टी के नेताओं और समर्थकों की नाराजगी खुलकर सामने आने लगी. उनकी दलील थी कि जब छात्र सड़कों पर संघर्ष कर रहे थे और आंदोलन आकार ले रहा था, तब कांग्रेस के बड़े नेता दिखाई नहीं दिए. अब जब मामला राष्ट्रीय सुर्खियों में आ गया, तो कांग्रेस राजनीतिक फायदा उठाने पहुंच गई.

यहीं से विपक्षी एकता की परतें खुलने लगीं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार को घेरने के लिए निकले दल आपस में ही श्रेय को लेकर भिड़ते नजर आए. आम आदमी पार्टी के समर्थकों ने कांग्रेस पर आंदोलन को ‘हाइजैक’ करने का आरोप लगाया, जबकि कांग्रेस ने खुद को छात्रों की सबसे मजबूत आवाज के रूप में पेश करने की कोशिश की.

दिलचस्प बात यह है कि धरना, सड़क पर प्रदर्शन और गिरफ्तारी को राजनीतिक हथियार बनाने की शैली लंबे समय से अरविंद केजरीवाल की राजनीति का अहम हिस्सा रही है. इस बार वही तरीका राहुल गांधी अपनाते दिखाई दिए. यही कारण है कि आम आदमी पार्टी की बेचैनी सिर्फ आंदोलन के श्रेय तक सीमित नहीं, बल्कि विपक्षी राजनीति में अपनी जगह बचाने से भी जुड़ी नजर आती है.

सुरक्षा को लेकर भी उठे सवाल

प्रधानमंत्री आवास के आसपास का इलाका अत्यंत संवेदनशील माना जाता है. ऐसे क्षेत्र में लंबे समय तक धरना और भीड़ जमा होने पर सुरक्षा एजेंसियों की चिंता स्वाभाविक है. इससे एक दिन पहले प्रदर्शनकारी संसद के नजदीक तक पहुंच गए थे, जिसके बाद सुरक्षा व्यवस्था कड़ी करनी पड़ी थी. अगले दिन प्रधानमंत्री आवास के पास विपक्षी नेताओं का धरना सुरक्षा और विरोध प्रदर्शन की सीमाओं पर नई बहस खड़ी करता है.

लोकतंत्र में विरोध करना विपक्ष का अधिकार है, लेकिन संवेदनशील सरकारी परिसरों के आसपास प्रदर्शन के लिए तय नियमों का पालन भी उतना ही जरूरी है. विपक्ष का आरोप है कि सरकार विरोध की आवाज को दबा रही है, जबकि प्रशासन का तर्क है कि सुरक्षा से किसी भी स्थिति में समझौता नहीं किया जा सकता.

पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा सवाल यही है कि पेपर लीक के खिलाफ शुरू हुई लड़ाई में छात्र कहां हैं? आंदोलन की शुरुआत उनके भविष्य, परीक्षा व्यवस्था और जवाबदेही के सवाल से हुई थी. लेकिन अब बहस इस पर टिक गई है कि राहुल गांधी ने कितना बड़ा धरना दिया, अखिलेश यादव ने गिरफ्तारी को कैसे राजनीतिक प्रदर्शन में बदला और अरविंद केजरीवाल की पार्टी कांग्रेस से क्यों नाराज है.

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नेताओं के बीच क्रेडिट की यह लड़ाई जितनी तेज होगी, छात्रों का असली मुद्दा उतना ही पीछे जाने का खतरा है. परीक्षा प्रणाली में सुधार, दोषियों पर कार्रवाई और प्रभावित अभ्यर्थियों को न्याय तभी मिलेगा, जब राजनीति का केंद्र नेता नहीं, छात्र बने रहेंगे.

-भारत एक्सप्रेस



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