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वसुधैव कुटुंबकम का गूंजा नारा: जी-7 में पीएम मोदी बोले- दूसरों की मदद करना भारत के संस्कार, अब बराबरी की साझेदारी का वक्त

फ्रांस के एवियन में जी-7 शिखर सम्मेलन को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने वैश्विक साझेदारियों में भरोसे और सम्मान की अहमियत पर जोर दिया. उन्होंने कहा कि दुनिया को अब दानदाता और याचक की सोच से ऊपर उठना होगा.

फ्रांस के एवियन में आयोजित जी-7 (G-7) शिखर सम्मेलन के आउटरीच सत्र से भारत ने पूरी दुनिया को एक बड़ा और स्पष्ट संदेश दिया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को वैश्विक मंच पर भारत का पक्ष रखते हुए कहा कि आज के दौर में ‘आपसी भरोसा’ ही सबसे बड़ी रणनीतिक ताकत है. पीएम मोदी ने साफ लफ्जों में कहा कि दुनिया इस वक्त संसाधनों की कमी से नहीं, बल्कि भरोसे की कमी से जूझ रही है. उन्होंने दुनिया के अमीर देशों को नसीहत दी कि अब हमें ‘दान देने और लेने वाले’ की पुरानी सोच से बाहर निकलकर बराबरी के स्तर पर काम करना होगा.

संकीर्ण स्वार्थों के लिए हो रहा तकनीक का इस्तेमाल

प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर भी अपनी बात साझा की. उन्होंने लिखा कि आज की दुनिया पहले से कहीं ज्यादा आपस में जुड़ी हुई है, लेकिन कई बार व्यापार और तकनीक का इस्तेमाल देश अपने संकीर्ण स्वार्थों के लिए करने लगते हैं. यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भरोसे का संकट खड़ा हो रहा है.

पीएम मोदी ने भारत के ‘वसुधैव कुटुंबकम’ (पूरी दुनिया एक परिवार है) के सिद्धांत को दोहराते हुए कहा कि विकास तभी सार्थक है, जब वह आम लोगों की जरूरतों और उनकी आकांक्षाओं से जुड़ा हो. भारत हमेशा ‘मानवता पहले’ की सोच के साथ आगे बढ़ा है.

आपदा में सबसे पहले मदद का हाथ बढ़ाता है भारत

भारत की वैश्विक भूमिका का जिक्र करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि चाहे श्रीलंका में चक्रवात हो, अफगानिस्तान का भूकंप, मोजाम्बिक की बाढ़ या फिर जमैका का भीषण तूफान; भारत हमेशा ‘फर्स्ट रिस्पॉन्डर’ की भूमिका में सबसे पहले मदद लेकर पहुंचता है. उन्होंने भारत की इंटरनेशनल सोलर अलायंस, ग्लोबल बायोफ्यूल्स अलायंस और ‘एक पेड़ मां के नाम’ जैसी बड़ी अंतरराष्ट्रीय पहलों का भी हवाला दिया.

ग्लोबल साउथ को मदद नहीं, बराबरी का सम्मान चाहिए

ग्लोबल साउथ (विकासशील देशों) की आवाज बुलंद करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि इन देशों को सिर्फ वित्तीय सहायता या दान नहीं, बल्कि बराबरी की हिस्सेदारी चाहिए. किसी भी साझेदारी की असली परीक्षा यह नहीं है कि हम दूसरों के लिए क्या बनाते हैं, बल्कि यह है कि हम उन्हें खुद के पैरों पर खड़ा होने में कितना सक्षम बनाते हैं. उन्होंने अफ्रीकी देशों में भारत द्वारा चलाए जा रहे कृषि, ऊर्जा और क्षमता निर्माण के प्रोजेक्ट्स का उदाहरण देते हुए कहा कि हमारी साझेदारियां हमेशा सम्मान पर टिकी होती हैं, किसी को निर्भर बनाने पर नहीं.

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-भारत एक्सप्रेस



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