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100वीं जयंती पर पीएम मोदी ने किया सुधींद्र तीर्थ स्वामी को याद, बताया सादगी और दयालुता का प्रतीक

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वाराणसी स्थित श्री काशी मठ संस्थान के 20वें मठाधीश श्रीमद् सुधींद्र तीर्थ स्वामी जी की जन्म शताब्दी पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की. पीएम ने उनके आध्यात्मिक और सामाजिक योगदान को नमन किया.

PM Modi pays tribute to Sudhindra Thirtha Swami

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को वाराणसी स्थित श्री काशी मठ संस्थान के श्रीमद् सुधींद्र तीर्थ स्वामीजी को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि पूजनीय संत ने अपना जीवन सेवा और आध्यात्मिकता को समर्पित कर दिया था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर लिखा, “उनकी जन्म शताब्दी के विशेष अवसर पर, वाराणसी के श्री काशी मठ संस्थान के श्रीमद् सुधींद्र तीर्थ स्वामी को श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं. उन्होंने अपना जीवन सेवा और आध्यात्मिकता के लिए समर्पित कर दिया था.”

स्वामी के योगदानों पर प्रकाश डालते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, “उन्होंने अनेक संस्थानों और अनुसंधान केंद्रों की स्थापना की और लोगों में शिक्षा का आनंद फैलाने के लिए वे अत्यंत उत्साही थे. उनकी शिक्षाएं सादगी, दयालुता और धर्मपरायणता पर बल देती हैं. भारत की संस्कृति और मूल्यों को संरक्षित और लोकप्रिय बनाने के उनके प्रयास भी उतने ही सराहनीय हैं, जिनकी उत्पत्ति हमारी भूमि में हुई थी.”

90 वर्ष की आयु में उनका निधन

श्री सुधींद्र तीर्थ स्वामीजी (31 मार्च, 1926 – 17 जनवरी, 2016), जिन्हें श्री सुधींद्र तीर्थ स्वामीजी के नाम से भी जाना जाता है, काशी मठ के विधिक और आध्यात्मिक प्रमुख (मठधिपति) और इसकी पूजनीय गुरु परंपरा में 20वें निरंतर संत थे.

हरिद्वार में रविवार की सुबह तड़के 90 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया. अपने आध्यात्मिक नेतृत्व के लिए व्यापक रूप से सम्मानित, वे 1949 में काशी मठ के 20वें प्रमुख बने और सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाले मठाधीश बने.

1926 को केरल के एर्नाकुलम में जन्म

उनका जन्म 31 मार्च 1926 को केरल के एर्नाकुलम में रामदासा शेनॉय और द्रौपदी के घर हुआ था और उनका मूल नाम सदाशिव शेनॉय था. उनके पिता एर्नाकुलम के श्री वेंकटरमण मंदिर के न्यासी थे. उन्होंने एर्नाकुलम के महाराजा कॉलेज में भौतिकी और रसायन विज्ञान सहित विज्ञान की पढ़ाई की.

1944 में ली थी दीक्षा

उन्होंने अपने महाविद्यालय के दौरान 1944 में अपने गुरु सुकृतेंद्र तीर्थ स्वामीजी से संन्यास की दीक्षा ली और बाद में उन्हें उनका उत्तराधिकारी नियुक्त किया गया. दीक्षा के बाद उन्होंने सांसारिक जीवन का त्याग कर अपनी आध्यात्मिक यात्रा पर प्रस्थान किया.

इन वर्षों में, उन्होंने कासरगोड, गुरुपुरा, मंगलुरु, मुंबई, उप्पिनंगडी और मूडबिद्री सहित देश भर के कई मंदिरों में मूर्तियों की स्थापना और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, और एक स्थायी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत छोड़ी.

नोट- यह खबर एजेंसी (IANS) फीड से सीधे पब्लिश की गई है. इसमें किसी भी जानकारी को नहीं बदला गया है. खबर को पढ़ने लायाक बनाने के लिए लिए केवल हेडलाइन बदली गई है. वहीं पैराग्राफ से पहले सबहेड जोड़े गए हैं. इस स्टोरी को लेकर भारत एक्सप्रेस की किसी भी तरह की नैतिक जिम्मेदारी नहीं होगी.



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