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संभल हिंसा में पुलिस से कहां हुई चूक? जिससे भड़का सुप्रीम कोर्ट; यूपी सरकार पर ठोका 10 लाख का जुर्माना

Sambhal Violence Supreme Court: संभल हिंसा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मुल्ला अफरोज की प्रिवेंटिव डिटेंशन को चुनौती देने वाली याचिका पर यूपी सरकार पर ₹10 लाख की कॉस्ट लगाई.

Sambhal

Sambhal Violence news: साल 2024 के चर्चित संभल हिंसा मामले में उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार और संभल पुलिस को सुप्रीम कोर्ट से बहुत बड़ा कूटनीतिक व कानूनी झटका लगा है. जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने मामले के आरोपी मुल्ला अफरोज की प्रिवेंटिव डिटेंशन (NSA) को खारिज करते हुए यूपी सरकार पर 10 लाख रुपये की भारी ‘कॉस्ट’ (जुर्माना) ठोक दी है.

देश की सबसे बड़ी अदालत ने राज्य पुलिस की उस सबसे बड़ी लापरवाही और तानाशाही रवैये की धज्जियां उड़ा दीं, जिसके तहत बिना किसी ठोस सबूत के केवल पुलिस हिरासत में दर्ज ‘कथित कबूलनामे’ के आधार पर नागरिक की आजादी छीन ली गई थी.

वो एक गलती जो पड़ गई भारी(Sambhal Violence news)

मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यूपी पुलिस और प्रशासन की जिस सबसे बड़ी चूक को पकड़ा, वह था ‘पुलिस कस्टडी में लिया गया बयान’. मुल्ला अफरोज को संभल हिंसा के काफी समय बाद गिरफ्तार किया गया था और उन पर प्रिवेंटिव डिटेंशन (NSA) लगाने का मुख्य आधार पुलिस कस्टडी के दौरान उनका कथित कबूलनामा ही बनाया गया.

सुप्रीम कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि भारतीय साक्ष्य कानून के तहत पुलिस कस्टडी में दिया गया बयान कानूनी रूप से अमान्य (Inadmissible) है. केवल इसके आधार पर किसी व्यक्ति के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) जैसी दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जा सकती.

इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर फिरा पानी

संभल की शाही जामा मस्जिद के सर्वे के दौरान भड़की हिंसा और 4 लोगों की मौत के मामले में मुल्ला अफरोज को बाद में आरोपी बनाया गया था. इसके बाद 13 अक्टूबर 2025 को उन पर NSA (धारा 3(2)) के तहत कार्रवाई कर प्रिवेंटिव डिटेंशन में भेज दिया गया. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जून 2026 में मुल्ला अफरोज की याचिका खारिज कर जिला प्रशासन के फैसले पर मुहर लगाई थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश को पलटते हुए राज्य सरकार की दलीलों की धज्जियां उड़ा दीं.

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने यूपी पुलिस से पूछे तीखे सवाल

मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच ने 8 सितंबर 2026 को ही अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था. सुनवाई के दौरान अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि पुलिस कस्टडी में दर्ज कराए गए किसी तथाकथित कबूलनामे को प्रिवेंटिव डिटेंशन का मुख्य आधार नहीं बनाया जा सकता. किसी व्यक्ति की निजी आजादी छीनने से पहले ठोस और स्वतंत्र साक्ष्यों का होना बेहद अनिवार्य है.

यूपी सरकार की दलीलें खारिज

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान यूपी सरकार और संभल जिला मजिस्ट्रेट के वकीलों ने तर्क दिया था कि संभल हिंसा के बाद इलाके में सार्वजनिक शांति और कानून-व्यवस्था पूरी तरह बिगड़ गई थी. भविष्य में आरोपी को ऐसी हिंसक गतिविधियों से रोकने के लिए प्रिवेंटिव डिटेंशन का ‘सब्जेक्टिव सैटिस्फैक्शन’ बेहद जरूरी था.

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार के इन तमाम तर्कों को अपर्याप्त और कानूनी प्रक्रियाओं का उल्लंघन माना.

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मस्जिद सर्वे के दौरान भड़की थी भीषण आगजनी

गौरतलब है कि साल 2024 में संभल स्थित ऐतिहासिक शाही जामा मस्जिद के अदालती सर्वे के दौरान भयंकर बवाल हुआ था. पथराव, आगजनी और पुलिस-उपद्रवियों के बीच हुई भीषण झड़प में 4 लोगों की जान चली गई थी. इस मामले में पुलिस ने कई स्थानीय नेताओं और आरोपियों पर शिकंजा कसा था, जिनमें से एक मुल्ला अफरोज भी थे.

-भारत एक्सप्रेस

 



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