Shyama Prasad Mukherjee Jayanti 2026: अखंड भारत के प्रणेता, प्रखर राष्ट्रवादी और भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जन्म-जयंती के ऐतिहासिक अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मां भारती के इस महान सपूत को नमन करते हुए एक विशेष और बेहद विस्तृत लेख लिखा है. पीएम मोदी ने अपने इस लेख में डॉ. मुखर्जी के बहुआयामी व्यक्तित्व, उनकी अटूट राष्ट्रसेवा, नेहरू मंत्रिमंडल से गरिमापूर्ण इस्तीफे और देश की अखंडता के लिए दिए गए उनके सर्वोच्च बलिदान को याद किया है.
पीएम मोदी ने साफ शब्दों में कहा है कि एक सशक्त, एकजुट और आत्मनिर्भर भारत का डॉ. मुखर्जी का विराट विज़न आज भी हमारे राष्ट्र निर्माण के संकल्प को नई ऊर्जा दे रहा है. स्वतंत्र भारत के इतिहास के कुछ गिने-चुने सबसे दूरदर्शी नेताओं में शामिल डॉ. मुखर्जी को याद करते हुए पीएम मोदी ने देश के सामने उनके जीवन के उन अनछुए पहलुओं को रखा है, जो आज के युवाओं के लिए राष्ट्रसेवा का सबसे बड़ा प्रेरणास्रोत हैं.
श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जीवन का संघर्ष
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने लेख में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के शुरुआती जीवन की सुख-सुविधाओं और उसके बाद उनके द्वारा चुने गए राष्ट्रसेवा के कठिन मार्ग को बेहद भावुक अंदाज में रेखांकित किया है. पीएम मोदी ने बताया कि डॉ. मुखर्जी का जन्म एक बेहद प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था, जहां उनके पिता सर आशुतोष मुखर्जी अपने समय के महान शिक्षाविद थे. तमाम ऐशो-आराम आसानी से मिलने के बावजूद उन्होंने त्याग का रास्ता चुना और अंग्रेजी हुकूमत से लेकर सांप्रदायिकता जैसी चुनौतियों के खिलाफ मूकदर्शक बनने के बजाय सीधे टकराने का फैसला किया. इस सफर में उन्होंने अपने छोटे बच्चे और पत्नी को खोने का गहरा व्यक्तिगत दुख भी झेला, लेकिन उनका संकल्प कमजोर नहीं हुआ.
वह कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे युवा कुलपति बने और शिक्षा व्यवस्था को बाबू बनाने की फैक्ट्री से ऊपर उठाकर युवाओं में नेतृत्व क्षमता विकसित करने का माध्यम बनाया. बाद में उन्होंने देश की प्रगति और सांस्कृतिक जड़ों को जोड़ने के लिए भारतीय जनसंघ की स्थापना की, जिसका चुनाव चिह्न ‘दीपक’ रखा गया—जो अपने आस-पास के गहरे से गहरे अंधकार को मिटाने की अद्भुत शक्ति का प्रतीक था.
इसके साथ ही डॉ. मुखर्जी अपनी मानवीय संवेदनाओं और सेवाभाव के लिए भी विशेष रूप से जाने जाते थे. वर्ष 1943 में जब बंगाल भीषण अकाल की त्रासदी से जूझ रहा था, तब उन्होंने पीड़ितों की सेवा में स्वयं को पूरी तरह समर्पित कर दिया था और ब्रिटिश हुकूमत की असंवेदनशीलता से आक्रोशित होकर ‘पंचाशेर मन्वंतर’ नाम की एक किताब भी लिखी थी. 1942 में जब मेदिनीपुर में भीषण चक्रवात आया, तब भी उन्होंने प्रभावित क्षेत्रों में राहत कार्यों का नेतृत्व किया. युवाओं को प्रेरित करने के उनके जज्बे का जिक्र करते हुए पीएम मोदी ने उनके कोलकाता के एक कॉलेज में दिए भाषण को याद किया, जिसमें डॉ. मुखर्जी ने युवाओं से आग्रह किया था कि आप जो भी कार्य करें, उसे पूरी गंभीरता, लगन और ईमानदारी से करें और किसी भी काम को कभी अधूरा न छोड़ें.
नेहरू सरकार से सैद्धांतिक मतभेद
लेख के सबसे महत्वपूर्ण और कड़क राजनीतिक हिस्से में प्रधानमंत्री ने डॉ. मुखर्जी के भारत की सीमाओं और संप्रभुता की रक्षा के लिए किए गए ऐतिहासिक संघर्षों का जिक्र किया है. पीएम मोदी ने याद दिलाया कि देश के विभाजन के समय पश्चिम बंगाल को भारत का अभिन्न अंग बनाए रखने में डॉ. मुखर्जी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण थी, और बाद में उन्होंने जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर भी बिल्कुल यही संघर्ष दोहराया जहां नजरबंदी के दौरान उनका सर्वोच्च बलिदान हुआ.
वर्ष 2019 में आर्टिकल 370 और 35(ए) को हटाया जाना उनके इसी बलिदान के प्रति देश की सच्ची श्रद्धांजलि थी. डॉ. मुखर्जी लोकतांत्रिक भावनाओं के कितने बड़े प्रतीक थे, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर राष्ट्र निर्माण के लिए वे पंडित नेहरू के पहले मंत्रिमंडल में शामिल हुए और देश के पहले उद्योग मंत्री के रूप में आधुनिक औद्योगिक भारत की नींव रखी.
लेकिन जब राष्ट्रीय महत्व के कुछ मुद्दों पर देशहित में मतभेद हुए, तो उन्होंने पूरी गरिमा के साथ कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया. पीएम मोदी ने 75 साल पहले नेहरू सरकार द्वारा लाए गए पहले संविधान संशोधन का भी जिक्र किया, जिसे अभिव्यक्ति की आजादी पर सीधा प्रहार माना गया था और डॉ. मुखर्जी उसके सबसे मुखर आलोचक रहे थे. पीएम मोदी ने नेहरू सरकार पर सीधा प्रहार करते हुए लिखा कि डॉ. मुखर्जी भली-भांति समझ चुके थे कि कांग्रेस किस हद तक जा सकती है और समय के साथ उनकी यह आशंका सही साबित हुई. जो पार्टी 75 वर्ष पहले पहला संविधान संशोधन लेकर आई थी, उसी ने 1975 में देश पर आपातकाल थोपा और लोकतांत्रिक मूल्यों की बुनियादी पर कुठाराघात किया.
‘विकसित भारत’ के संकल्प का विज़न
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के उस विराट औद्योगिक और आर्थिक विज़न को भी दुनिया के सामने रखा, जो नए-नए आज़ाद हुए भारत के लोगों में सम्मान, अवसर और आत्मविश्वास का संचार करने का माध्यम था. डॉ. मुखर्जी वेल्थ और वैल्यू क्रिएशन के महत्व को भली-भांति समझते थे और इसीलिए उन्होंने दामोदर वैली कॉरपोरेशन, सिंदरी उर्वरक संयंत्र और एक मजबूत औद्योगिक नीति जैसी ऐतिहासिक पहल करके आधुनिक औद्योगिक भारत की नींव रखी थी. इस औद्योगिक विकास के साथ उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि भारत के पारंपरिक सामर्थ्य की कभी उपेक्षा न हो, और वे हथकरघा, कुटीर उद्योग, कारीगरों और कपड़ा उद्योग से जुड़े श्रमिकों के हितों के भी प्रबल समर्थक थे.
यहां पीएम मोदी ने अपना एक बेहद विशेष और निजी अनुभव भी साझा किया. उन्होंने बताया कि आत्मनिर्भर भारत के स्पष्ट विज़न के साथ जिस सिंदरी संयंत्र की स्थापना के लिए डॉ. मुखर्जी ने अथक प्रयास किए थे, उसकी कई दशकों तक सत्ता में रहने वाले लोगों ने घोर उपेक्षा की. पीएम मोदी ने संतोष व्यक्त करते हुए लिखा कि उनकी सरकार को उस सिंदरी संयंत्र के पुनरुद्धार का सौभाग्य मिला और उस पुनरुद्धार कार्यक्रम में उपस्थित होना उनके सार्वजनिक जीवन के सबसे विशेष और अविस्मरणीय क्षणों में से एक बन गया. लेख के अंत में पीएम मोदी ने कहा कि आज हमारा देश विकसित भारत के लक्ष्य की ओर तेजी से आगे बढ़ रहा है, ऐसे में डॉ. मुखर्जी के प्रति देश की सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम प्रतिदिन उस सशक्त, एकजुट, आत्मविश्वास से भरपूर और संवेदनशील भारत के निर्माण की दिशा में निरंतर प्रयास करें, जिसकी उन्होंने परिकल्पना की थी.
-भारत एक्सप्रेस
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