Madhya Pradesh में सांप के काटने की घटनाएं लगातार चिंता बढ़ा रही हैं. आंकड़े चौंकाने वाले हैं. साल 2025 के सिर्फ पहले छह महीनों में ही 4,205 लोग सर्पदंश का शिकार हो चुके हैं. जबकि साल 2024 में यह आंकड़ा 4,933 था.
हालाँकि बीते साल की तुलना में यह मामूली गिरावट है, लेकिन यह भी साफ है कि सर्पदंश प्रदेश की एक बड़ी स्वास्थ्य चुनौती बनता जा रहा है.
एम्बुलेंस सेवा 108 द्वारा जारी एमपी स्नेक बाइट केस रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले पांच सालों में यानी 2020 से 2024 के बीच 10,700 से ज़्यादा लोगों की मौत सांप के काटने से हो चुकी है. यह स्थिति किसी आपातकाल से कम नहीं.
सागर जिला बना सबसे बड़ा हॉटस्पॉट
ताज़ा आंकड़ों पर नज़र डालें तो सागर जिला सबसे अधिक प्रभावित है, जहां जून 2025 तक 311 लोगों को सांप ने काटा है. इसके बाद
- रीवा – 223 मामले
- कटनी – 179 मामले
- दमोह – 163 मामले
- छिंदवाड़ा – 151 मामले
- ग्वालियर – 144 मामले
- राजधानी भोपाल में भी 68 लोग सर्पदंश का शिकार हुए हैं. बता दें कि अब तक भोपाल में 8 मौतें दर्ज की गई हैं
सांप का काटना अब ‘स्थानीय आपदा’ घोषित
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए मध्य प्रदेश सरकार ने सर्पदंश को स्थानीय आपदा के रूप में मान्यता दी है. इसके तहत अब गांवों में ‘सर्पमित्रों’ की भर्ती की जा रही है जो सांपों से निपटने और लोगों को जागरूक करने का काम करेंगे. साथ ही, अस्पतालों में जरूरी दवाएं और संसाधन उपलब्ध कराने की प्रक्रिया तेज की गई है.
मुआवज़े में 427 करोड़ खर्च, सवाल उठने लगे हैं
सरकार ने सांप के काटने से जान गंवाने वाले लोगों के परिजनों को प्रत्येक मामले में 4 लाख रुपये का मुआवजा दिया है. बीते चार वर्षों में इस मद में कुल 427 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इस राशि का एक हिस्सा सर्पदंश रोकथाम के लिए स्थायी संरचना पर खर्च होता — जैसे प्रत्येक जिले में विष उपचार केंद्र (Anti-venom units) या जन-जागरूकता अभियान, तो मौतों की संख्या काफी कम की जा सकती थी.
जंगलों में फैला खतरा, जागरूकता की कमी बनी बड़ी चुनौती
मध्य प्रदेश में घने जंगलों और खेत-खलिहानों की भरमार है, जहां सांपों की कई प्रजातियां पाई जाती हैं. ग्रामीण इलाकों में जानकारी और संसाधनों की कमी के चलते लोग समय पर इलाज नहीं ले पाते, जिससे मौत का खतरा बढ़ जाता है.
राज्य सरकार अब इस दिशा में ठोस कदम उठाने का दावा कर रही है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि केवल मुआवज़ा देना काफी नहीं.
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-भारत एक्सप्रेस
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