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सैयद शाह मोहम्मद निज़ामी के रूप में राष्ट्र ने खोया इंसानियत का मार्गदर्शक : इंद्रेश कुमार

Syed Shah Mohammad Nizami Death दरगाह हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया (दिल्ली) के सज्जादानशीन हज़रत सैयद शाह मोहम्मद निज़ामी के इंतकाल से पूरे देश में गहरा शोक फैल गया है. उनका जाना सिर्फ़ मुसलमानों के लिए ही नहीं, भारत की साझा संस्कृति, सूफी परंपरा और गंगा-जमुनी तहज़ीब के लिए एक बड़ी और अपूरणीय क्षति माना जा रहा है.

Syed Shah Mohammad Nizami death

Syed Shah Mohammad Nizami Death: दरगाह हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया (दिल्ली) के सज्जादानशीन हज़रत सैयद शाह मोहम्मद निज़ामी के इंतकाल से पूरे देश में गहरा शोक फैल गया है. उनका जाना सिर्फ़ मुसलमानों के लिए ही नहीं, भारत की साझा संस्कृति, सूफी परंपरा और गंगा-जमुनी तहज़ीब के लिए एक बड़ी और अपूरणीय क्षति माना जा रहा है. हज़रत निज़ामी साहब की पूरी ज़िंदगी मोहब्बत, सब्र, खिदमत (सेवा) और इंसानियत के पैग़ाम से जुड़ी रही. उन्होंने कभी नफ़रत या तकरार की ज़बान नहीं बोली, बल्कि हर मौके पर अमन, भाईचारे और इंसान को इंसान समझने की सीख दी. उनका जीवन इस बात का सबूत था कि सच्ची रूहानियत वही है जो दिलों को जोड़ती है.

इंद्रेश कुमार: सुल्ह-ए-कुल की ज़िंदा मिसाल थे निज़ामी

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य और मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के मार्गदर्शक इंद्रेश कुमार ने हज़रत निज़ामी साहब के इंतकाल पर गहरा दुःख व्यक्त करते हुए कहा कि उनका जाना राष्ट्र की साझा विरासत के एक मज़बूत स्तंभ का गिर जाना है. इंद्रेश कुमार ने कहा कि हज़रत सैयद शाह मोहम्मद निज़ामी साहब सुल्ह-ए-कुल यानी सबके साथ शांति, प्रेम और भाईचारे की ज़िंदा मिसाल थे. उन्होंने अपने पूरे जीवन से यह साबित किया कि सच्चा धर्म वही है जो समाज को जोड़ता है, नफ़रत को दूर करता है और इंसानियत की सेवा करता है.

इंद्रेश कुमार ने कहा कि हज़रत निज़ामी साहब का जीवन मज़हब, जाति और भाषा की सीमाओं से ऊपर उठकर इंसान को इंसान से जोड़ने का संदेश देता रहा. उन्होंने ऊपर वाले से प्रार्थना की कि दिवंगत आत्मा को शांति मिले और उनके परिवार, मुरीदों तथा चाहने वालों को यह बड़ा सदमा सहने की शक्ति प्राप्त हो. उन्होंने कहा कि ऐसे बुज़ुर्ग सदियों में पैदा होते हैं और उनका जाना समाज के लिए गहरी कमी छोड़ जाता है.

इंद्रेश कुमार ने आगे कहा कि हज़रत निज़ामी साहब की खानकाह हमेशा सेवा, सद्भाव और इंसानियत का मरकज़ (केंद्र) रही. वहां हर धर्म, हर समुदाय और हर सोच के लोगों का एक समान सम्मान के साथ स्वागत किया जाता था. उनकी खानकाह से कभी भेदभाव नहीं, बल्कि मोहब्बत, संवाद और आपसी समझ का पैग़ाम मिलता रहा. उन्होंने कहा कि हज़रत निज़ामी साहब का मार्गदर्शन समाज के लिए एक जलते हुए दीपक की तरह था, जो अंधेरे में भी रास्ता दिखाता रहा. अब उस रोशनी की कमी लंबे समय तक महसूस की जाएगी.

शाहिद सईद: इंसानियत और राष्ट्र-एकता के सच्चे रहनुमा

मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के राष्ट्रीय संयोजक शाहिद सईद ने अपने शोक संदेश में कहा कि हज़रत सैयद शाह मोहम्मद निज़ामी साहब इंसानियत, अमन और राष्ट्र-एकता के सच्चे रहनुमा थे. उन्होंने कहा कि हज़रत निज़ामी साहब ने कभी मज़हब के नाम पर दीवारें नहीं खड़ी कीं, बल्कि मोहब्बत और भाईचारे के पुल बनाए. उनका पैग़ाम साफ़ और सादा था—मुल्क तभी मज़बूत बनेगा, जब दिल जुड़े रहेंगे और समाज में आपसी भरोसा कायम रहेगा.

शाहिद सईद ने कहा कि आज के दौर में, जब समाज को तोड़ने वाली आवाज़ें तेज़ हैं, हज़रत निज़ामी साहब जैसे बुज़ुर्गों की सोच और ज़रूरत और भी ज़्यादा महसूस होती है. उनका जाना राष्ट्र के लिए एक बड़ी नैतिक और सामाजिक क्षति है.

डॉ. शालिनी अली: मोहब्बत और सब्र की सशक्त आवाज़

समाजसेवी और राजनीतिक विश्लेषक डॉ. शालिनी अली ने कहा कि हज़रत निज़ामी साहब सिर्फ़ एक धार्मिक शख़्सियत नहीं थे, बल्कि वे इंसानियत की सशक्त और सच्ची आवाज़ थे. उन्होंने कहा कि मोहब्बत, सब्र और आपसी इज्ज़त का जो पैग़ाम हज़रत निज़ामी साहब ने दिया, वह आज के तनाव और बंटवारे से भरे माहौल में और भी ज़्यादा अहम हो गया है. उनका जाना एक युग का अंत है, लेकिन उनके विचार और उनकी सीख समाज को आगे भी रास्ता दिखाती रहेंगी.

डॉ. शाहिद अख्तर: निजामी नहीं रहे, पैग़ाम हमेशा ज़िंदा रहेंगे

राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थान आयोग (NCMEI) के कार्यकारी अध्यक्ष डॉ. शाहिद अख्तर ने कहा कि हज़रत निज़ामी साहब तसव्वुफ़ यानी सूफी सोच की जीवंत मिसाल थे. उन्होंने कहा कि उनकी ज़िंदगी में इबादत के साथ-साथ समाज के प्रति ज़िम्मेदारी साफ़ दिखाई देती थी. शिक्षा, संवाद और खिदमत पर उनका ज़ोर उन्हें एक महान सूफी बुज़ुर्ग बनाता है. उनका इंतकाल आध्यात्मिक और सामाजिक जगत के लिए गहरा नुकसान है, जिसकी भरपाई आसान नहीं है.

हज़रत निज़ामी साहब के इंतकाल पर देश के कई हिस्सों में दुआओं और श्रद्धांजलि सभाओं का सिलसिला जारी है. दरगाह निज़ामुद्दीन औलिया में बड़ी संख्या में लोग पहुंचकर फातिहा पढ़ रहे हैं और उन्हें आख़िरी सलाम पेश कर रहे हैं. हर मज़हब और हर समुदाय के लोग उन्हें याद कर रहे हैं, जो इस बात का प्रमाण है कि उनका पैग़ाम दिलों तक पहुंचा था.

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हज़रत सैयद शाह मोहम्मद निज़ामी का जीवन भारत की साझा संस्कृति, अमन और भाईचारे का सजीव प्रतीक रहा. उनका पैग़ाम—मोहब्बत, इंसानियत और सुल्ह-ए-कुल—वक़्त और सरहदों से परे है. भले ही वे आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी सोच, उनकी सीख और उनका रास्ता आने वाली पीढ़ियों को इंसानियत और सद्भाव के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता रहेगा.

-भारत एक्सप्रेस



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