विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने शिक्षण संस्थाओं में कास्ट डिस्क्रिमिनेशन को रोकने के लिए नया नियम लागू किया है. जिसकी वजह से शैक्षणिक गलियारों में बहस शुरू हो गई है. दिल्ली, लखनऊ सहित देशभर के कई विश्वविद्यालयों में छात्र उग्र प्रदर्शन कर रहे हैं. प्रदर्शन कर रहे छात्र सवर्ण समाज से आते हैं.
सवर्ण समाज के छात्रों का कहना है कि UGC के नए नियम ने उन्हें अपराधी मान लिया है. जिसका वो कड़ा विरोध करते हैं. छात्र इस दौरान पीएम मोदी और गृह मंत्री अमित शाह का पुतला भी दहन कर UGC के नए नियम को वापस लेने की मांग कर रहे हैं. जिसके बाद यह चर्चा तेज हो गई है कि आखिर केंद्र सरकार को ऐसा नियम क्यों लाना पड़ा और उच्च शिक्षण संस्थानों में जनरल, ओबीसी, एससी और एसटी की कितनी हिस्सेदारी है?
पहले समझते हैं कि आखिर नियम क्या है और आपत्ति क्यों है?
UGC ने 13 जनवरी को प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन रेगुलेशन 2026 लागू किया. जिसका उद्वेश्य उच्च शिक्षण संस्थानों में SC-ST, OBC, EWS, महिलाओं और दिव्यांगों के साथ परिसर में होने वाले भेदभाव को खत्म करना. इसमें सभी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में 9 सदस्यों वाली एक समिति का गठन करने का प्रावधान है. जिसमें संस्थान के प्रमुख, 3 प्रोफेसर, 1 कर्मचारी, दो सामान्य व्यक्ति, एक को-ऑर्डिनेटर और दो आमंत्रित छात्र शामिल होंगे. इसमें से कम से कम 5 सीटें SC-ST, OBC, दिव्यांगजन और महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी.
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियमों का विरोध कर रहे सवर्ण छात्रों का कहना है कि नए नियम में उनके साथ अन्याय हुआ है. इसमें सवर्ण छात्रों को पहले ही दोषी ठहराया गया है. अगर समिति भेदभाव संबंधित शिकायतों की जांच करेगी तो सामान्य वर्ग की बात रखने के लिए उसमें कोई प्रतिनिधि ही नहीं होगा. आलोचकों का तर्क है कि नए नियम में हमेशा की तरह एक वर्ग शोषित है और दूसरा वर्ग हमेशा शोषक. इससे शिक्षण संस्थान शिक्षा नहीं बल्कि कोर्ट का मैदान बन जाएंगे.
उच्च शिक्षण संस्थाओं में जातिगत अनुपात
AISHE (All India Survey on Higher Education) की रिपोर्ट में भारत के उच्च शिक्षण संस्थानों यानी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जातिगत अनुपात बताया गया है. AISHE के डेटा में सवर्ण, OBC, SC और ST छात्रों की संख्या की जानकारी दी गई है.
रिपोर्ट के मुताबिक उच्च शिक्षण संस्थानों में कुल छात्रों की संख्या में सबसे ज्यादा जनरल यानी सवर्ण छात्रों की रही. सवर्णों की कुल संख्या 44.2% थी. इसके बाद क्रमश: OBC- 35.8%,SC-14.2% और ST- 5.8% रही.
हालांकि IIM का हालिया रिपोर्ट इस दावे से थोड़ा अलग है. इस रिपोर्ट के मुताबिक उच्च शिक्षण संस्थानों में SC,ST और OBC छात्रों की संख्या कुल संख्या 60.8% तक है. वहीं सवर्ण छात्रों की संख्या घटकर 39% रह गई है.
साल 1990 के दशक में ज्यादा थी सवर्णों की संख्या
आजादी के बाद भारत में मौजूद उच्च शिक्षण संस्थानों में कितने एससी-एसटी और ओबीसी के छात्र पढ़ते थे इसका आंकड़ा मौजूद नहीं है. हालांकि साल 1990 में जब मंडल कमीशन लागू हुआ तब ओबीसी को 27% आरक्षण दिया गया. जिसके बाद सवर्ण छात्रों की आबादी में कमी देखी गई.
साल 1990 में सवर्ण छात्रों की संख्या 50 से 60 प्रतिशत थी. ओबीसी की 15-30 प्रतिशत और एससी की 10 से 18 व एसटी 5-8 प्रतिशत के बीच थी. साल 2000 के बाद ओबीसी और एससी-एसटी छात्रों की संख्या उच्च शिक्षण संस्थानों में बढ़नी शुरू हुई.
हालांकि IIT और IIM जैसे शिक्षण संस्थानों में OBC, SC और ST छात्रों की संख्या ज्यादा है. इसका मुख्य कारण इन संस्थानों में कड़ाई से पालन होने वाला आरक्षण है. जिसके मुताबिक ओबीसी को 27%, एससी को 15%, एसटी को 7.5% और EWS को 10% आरक्षण मिलता है.
भेदभाव के बढ़ते मामले
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने संसदीय समिति और सुप्रीम कोर्ट को विश्वविद्यालयों में बढ़ते जातिगत भेदभाव के मामलों के संबंध में एक रिपोर्ट दी. जिसके मुताबिक पिछले 5 सालों में उच्च शिक्षण संस्थाओं में जाति आधारित भेदभाव के मामलों में 118.4% की बढ़ोतरी हुई है. जो 2019-2020 में 173 से बढ़कर 2023-2024 में 378 हो गए.
दलित विद्वान अनिल चमाडिया एक मीडिया संस्थान को दिए इंटव्यू में बताते हैं कि,
उच्च शिक्षा में जाति आधारित भेदभाव में वृद्धि सिर्फ संख्या का मामला नहीं है. यह हाशिए पर रहने वाले छात्रों में बढ़ती जागरूकता और जातिगग विचारधाराओं को दिए जा रहे संरक्षण से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है.
उनका कहना है कि वंचित और पिछड़ी जातियों के पहली पीढ़ी के छात्र जब बड़ी संख्या में विश्वविद्यालयों में जाते हैं तो प्रभावशाली समूहों को उनको स्वीकार करना बहुत मुश्किल हो जाता है. छात्रों में जागरूकता आने के बाद भेदभाव के मामलों में इजाफा हुआ है. क्योंकि इससे प्रभावशाली समूह खुद को खतरे में पाते हैं.
कैसे होती है कार्रवाई?
पहले कोई प्रोफेसर या कर्मचारी जातिगत भेदभाव के मामले में दोषी पाया जाता है तो उसे निलंबित किया जाता है या फिर उसकी पदोन्नति रोक दी जाती है. हाल के सालों में डीयू के कुछ कॉलेजों में प्रिंसिपल पर भी केस दर्ज किया गया.
रिपोर्ट के मुताबिक यूपी और राजस्थान में सबसे ज्यादा जातिगत भेदभाव के मामले सामने आए हैं. इसलिए वहां सबसे ज्यादा केस दर्ज किए गए. शिकायत मिलने के बाद पुलिस जांच करती है और जांच से जो निकलकर सामने आता है, उस अनुसार विधिसम्मत कार्रवाई की जाती है.
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क्यों बनाना पड़ा यह नियम?
UGC ने यह नियम सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद उठाया है. सर्वोच्च न्यायालय ने रोहित वेमुला और पायत ताडवी की मौत के बाद शिक्षण संस्थाओं में जातिगत भेदभाव के मामलों पर सुनवाई की और नियम बनाने का निर्देश दिया.
बता दें कि, साल 2016 में हैदराबाद विश्वविद्यालय में पीएचडी करने वाले दलित छात्र रोहित वेमुला ने कथित रूप से संस्थागत भेदभाव के चलते फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी. वहीं मुंबई के टीएन टोपीवाला राष्ट्रीय चिकित्सा महाविद्यालय में आदिवासी छात्रा पायल ताडवी ने भी कथित भेदभाव के चलते 2019 में आत्महत्या की थी. इन दो मौतों ने भारत के शैक्षणिक समुदाय को झकझोर कर रख दिया था.
-भारत एक्सप्रेस
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