Uniform Civil Code (Ai Generated)
Uniform Civil Code: समान नागरिक संहिता यानी यूसीसी पर बहस अब संसद से निकल कर विभिन्न राज्यों की विधानसभा तक जा पहुंची है. गोवा, उत्तराखंड, गुजरात और असम के बाद चार अन्य राज्य भी UCC लागू करने की कानूनी प्रक्रिया में शामिल हो गए हैं. केंद्रीय स्तर पर UCC को लेकर सहमति न बन पाने के कारण, भाजपा सरकार अब इसे राज्यों में लागू कर परख रही हैं. अब सवाल यह उठता है कि जब UCC संविधान के अनुच्छेद 44 के तहत पूरे भारत को एक ही कानूनी दायरे में लाने का एक जरिया था, तो केंद्र सरकार इसे राष्ट्रीय स्तर पर लाने के बजाय राज्यों के जरिए क्यों लागू करवा रही है?
जानिये क्या है समान नागरिक संहिता?
समान नागरिक संहिता (UCC) के तहत देश के सभी धर्मों और समुदायों के लिए एक समान व्यक्तिगत कानून बनाने की वकालत की गई है, जिससे मौजूदा मजहबी कानून (personal laws) निष्प्रभावी हो जाएंगे. संवैधानिक रूप से यह संविधान के अनुच्छेद 44 (नीति निदेशक तत्व) के अंतर्गत आती है, जो राज्य को पूरे भारत में नागरिकों के लिए एक समान सिविल कोड सुनिश्चित करने का निर्देश देता है.
राजनीतिक मोर्चे पर, यह मुद्दा एक सदी से भी अधिक समय से बहस के केंद्र में है और भाजपा ने इसे हमेशा अपने प्राथमिक एजेंडे में शामिल रखा है. साल 2014, 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा ने इसे अपने चुनावी घोषणापत्र का मुख्य हिस्सा बनाया था. जिसमें उसने यूसीसी को संसद के जरिए देश में लागू करने पर जोर दिया. अब भाजपा की इस रणनीति में एक बड़ा बदलाव देखा जा रहा है.
केंद्र सरकार राष्ट्रीय स्तर पर क्यों नहीं ला रही यूसीसी?
देशभर के कई राज्यों में समान नागरिक संहिता (UCC) को लेकर हलचल तेज है, लेकिन केंद्र सरकार इस मुद्दे पर पूरी तरह शांत है. जानकारों का मानना है कि इस खामोशी की सबसे बड़ी वजह पूरे देश के नागरिकों और राजनीतिक दलों की सहमति न होना है. गौर करने की बात यह है कि संविधान का अनुच्छेद 44 सिर्फ एक नीति-निदेशक तत्व (Directive Principle) है, जिसे सरकार लागू नहीं करवा सकती.
अनुच्छेद 371 और छठी अनुसूची के तहत पूर्वोत्तर राज्यों (नागालैंड, मिजोरम, असम, मेघालय) को विशेष अधिकार मिले हैं जिसके कारण स्थानीय विधानसभा या जनजातीय परिषदों की मंजूरी के बिना संसद का कोई भी कानून वहां लागू नहीं हो सकता. यही वजह है कि देशव्यापी UCC लाने से केंद्र सरकार को एनडीए (NDA) के सहयोगी दलों, खासकर पूर्वोत्तर की पार्टियों के नाराज होने और गठबंधन टूटने का डर सता रहा है, जबकि विधि आयोग भी पहले ही इसे ‘अभी जरूरी नहीं’ बता चुका है.
भाजपा शासित राज्यों में लागू UCC कितनी कामयाब रही है ?
केंद्रीय कानून के बजाय राज्यों द्वारा अलग-अलग समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करने से देश में ‘कानूनी बिखराव’ का एक नया जोखिम खड़ा हो गया है. जानकारों के मुताबिक, इस व्यवस्था के कारण एक ही देश के भीतर नागरिकों के शादी, तलाक और संपत्ति के अधिकार अब राज्यों की सीमाओं के साथ बदलते नजर आएंगे, जो ‘एक देश, एक कानून’ के मूल राष्ट्रीय उद्देश्य के खिलाफ है.
राजनीतिक और प्रशासनिक मोर्चे पर भाजपा शासित राज्यों में यह रणनीति आंशिक रूप से सफल रही है. उत्तराखंड ने जनवरी 2025 में देश का पहला डिजिटल और पेपरलेस UCC मॉडल लागू कर लाखों शादियों का सफल रजिस्ट्रेशन किया, तो वहीं असम ने मई 2026 में बाल विवाह रोकने के सख्त प्रावधानों के साथ अपना UCC बिल पास किया है. हालांकि, देश की करीब 8.6% आदिवासी आबादी को इन नागरिक संहिताओं से पूरी तरह बाहर रखना और उत्तराखंड में लिव-इन रजिस्ट्रेशन की अनिवार्य शर्तों जैसे विवादों ने इस कानून की एकरूपता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
2029 चुनाव: UCC की असली परीक्षा
भाजपा 2029 आम चुनाव से पहले राज्य दर राज्य UCC को एक राजनीतिक प्रयोगशाला की तरह इस्तेमाल कर सकती है, ताकि राष्ट्रीय कानून लाने से पहले जनता की प्रतिक्रिया और कानूनी चुनौतियां भांप ली जाएं. पर इस रास्ते से नई जटिलताएं भी उभर रही हैं. जैसे- अगर कोई व्यक्ति उत्तराखंड में विवाह करे और महाराष्ट्र में रहे, तो कौन सा कानून लागू होगा? यह अभी स्पष्ट नहीं है.
विभिन्न राज्यों में लागू होते UCC का विपक्ष कड़ी आलोचना भी कर रहा है. हर राज्य में आदिवासी समुदायों को समान नागरिक संहिता (UCC) से बाहर रखा जा रहा है, जिससे सवाल उठता है कि क्या इसे सच में ‘समान’ नागरिक संहिता कहा जा सकता है? मध्य प्रदेश कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद ने भी यही सवाल उठाया है.
(यह खबर सौम्या सिंह ने लिखी है. सौम्या भारत एक्सप्रेस में इंटर्न के रूप में काम कर रही हैं.)
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