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Explainer: क्यों भारत के गांव सिर्फ रील्स में स्वर्ग हैं? जानिए उस खुरदरी सच्चाई को, जिस पर कोई खुलकर बात नहीं करता

Village Life Heaven Or Hell: गांव की जिंदगी की खूबसूरत तस्वीर के पीछे छिपी हकीकत क्या है? छुआछूत, महिलाओं के खिलाफ हिंसा, खेती से कमाई और स्वास्थ्य सुविधाओं के आंकड़े बताते हैं कि गांव में हर किसी का अनुभव एक जैसा नहीं होता. जानिए, गांव को स्वर्ग या नर्क मानने के बजाय उसकी पूरी तस्वीर समझना क्यों जरूरी है.

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भारत के गांवों में आज भी जिंदा है छुआछूत और सामाजिक भेदभाव (इमेज-AI)

खबर की 5 बड़ी बातें

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  • 27 फीसदी परिवारों ने छुआछूत मानने की बात स्वीकार की. गांवों में यह आंकड़ा 30 फीसदी था.
  • करीब 32 फीसदी शादीशुदा महिलाओं ने पति की तरफ से हिंसा झेलने की बात कही.
  • खेती करने वाले परिवारों की औसत मासिक आमदनी 10,218 रुपये थी.
  • ग्रामीण सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों के करीब 80 फीसदी पद खाली थे.
  • गांवों की स्थानीय सरकारों में महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 44 फीसदी है.

Village Life Heaven Or Hell: सोशल मीडिया की रील्स खोलिए, तो गांव की एक ऐसी तस्वीर सामने आती है जो सांसें थाम लेती है. कच्ची मिट्टी का घर, आंगन में खड़ा नीम का पेड़, उसके नीचे बिछी चारपाई, चूल्हे पर पकती मक्के की रोटी और साथ में गर्मागर्म सरसों का साग. पास ही बंधी कोई भैंस और ढलते सूरज की सुनहरी धूप. ऐसी तस्वीरें और वीडियो देखकर शहरों की भागदौड़ और कंक्रीट के जंगलों में दम तोड़ रहे लोगों को अक्सर यह भ्रम हो जाता है कि असली सुकून तो बस गांव में ही है. मन यही कहता है कि बस किसी तरह नौकरी से रिटायरमेंट मिल जाए, फिर गांव में एक छोटा सा घर खरीदेंगे और शांति से जिंदगी बिताएंगे.

लेकिन, क्या सचमुच गांव की जिंदगी उतनी ही आसान और सुकून भरी होती है जितनी इंस्टाग्राम या फेसबुक पर दिखाई जाती है? क्या वहां जातिगत भेदभाव का कोई नामो-निशान नहीं होता? क्या वहां औरों की तरह महिलाओं को भी अपनी जिंदगी के फैसले लेने की पूरी आजादी मिलती है? क्या खेती-किसानी से इतनी कमाई हो जाती है कि एक परिवार आराम से अपनी दाल-रोटी चला सके? और सबसे बड़ा व गंभीर सवाल-अगर कोई अचानक रात-बिरात बीमार पड़ जाए, तो क्या वहां समय पर डॉक्टर और इलाज मिल पाना मुमकिन है?

इन खूबसूरत और सुहाने नजारों के पीछे गांव की एक ऐसी खुरदरी और कड़वी सच्चाई भी छिपी है, जिस पर अमूमन कोई खुलकर बात नहीं करना चाहता. किसी एक इंसान के लिए गांव का अनुभव भले ही अपनापन, सुरक्षा और सुकून से भरा हो सकता है; लेकिन वही गांव किसी दूसरे इंसान के लिए पाबंदियों, भेदभाव और चौबीसों घंटे की दमघोंटू सामाजिक निगरानी की जगह बन सकता है. इसलिए, सिर्फ बाहर की सुंदरता को देखकर गांव को मापने के बजाय, वहां की जमीनी सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था को गहराई से समझना बेहद जरूरी है.

गांवों में आज भी कितना गहरा है जातिगत भेदभाव?

गांव के सामाजिक ताने-बाने को अगर करीब से देखना है, तो छुआछूत से जुड़े आंकड़े आंखें खोलने के लिए काफी हैं. ‘इंडियन ह्यूमन डेवलपमेंट सर्वे’ के तहत देश भर के 42,152 घरों में एक बड़ा सर्वे किया गया था. इसमें लोगों से सीधे तौर पर यह सवाल पूछा गया था कि क्या उनके घरों में आज भी छुआछूत मानी जाती है? यानी, क्या उनके यहां किसी दूसरी जाति के इंसान को रसोई में आने या बर्तन छूने की इजाजत है?

सर्वे का चौंकाने वाला आंकड़ा: 27 फीसदी परिवारों ने माना कि वे छुआछूत का पालन करते हैं. गांवों में यह आंकड़ा करीब 30 फीसदी था, जबकि शहरों में 20 फीसदी परिवारों ने ऐसा माना.

जातिवार आंकड़ों पर नजर डालें तो ब्राह्मण परिवारों में 52 फीसदी, ओबीसी परिवारों में 33 फीसदी और अन्य अगड़ी जातियों के 24 फीसदी लोगों ने छुआछूत मानने की बात स्वीकार की. वहीं, अनुसूचित जनजाति के परिवारों में यह आंकड़ा 15 फीसदी और अनुसूचित जाति के परिवारों में 22 फीसदी पाया गया.

इससे एक बात बिल्कुल साफ हो जाती है-जातिगत भेदभाव समाज के किसी एक दायरे तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हर स्तर पर फैला हुआ है. हैरानी की बात तो यह है कि अच्छी-खासी पढ़ाई-लिखाई और डिग्रियां हासिल करने के बाद भी लोगों की इस मानसिकता में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है. सर्वे बताता है कि अशिक्षित परिवारों में छुआछूत मानने का रेट 29 फीसदी था, तो वहीं ग्रेजुएट परिवारों में भी यह 23 फीसदी दर्ज किया गया. यानी सिर्फ हाथ में डिग्री आ जाने से जाति को लेकर बनी पुरानी और संकीर्ण सोच खत्म नहीं हो जाती.

जातिगत भेदभाव की तस्वीर: ब्राह्मण परिवारों में 52 फीसदी, ओबीसी परिवारों में 33 फीसदी और अनुसूचित जाति के परिवारों में 22 फीसदी लोगों ने छुआछूत मानने की बात स्वीकार की.

शादी के फैसलों पर जाति का पहरा

जाति और छुआछूत का यह दायरा सिर्फ खाने-पीने या मेलजोल तक ही सीमित नहीं रहता. जब बात दो लोगों के जीवनसाथी चुनने यानी शादी-ब्याह की आती है, तो जाति की दीवारें और भी ज्यादा मजबूत और ऊंची दिखाई देती हैं.

सामने आए आंकड़ों के मुताबिक, हमारे देश में आज भी कुल शादियों में से महज 5 फीसदी शादियां ही अंतरजातीय (Inter-caste) होती हैं. इसका मतलब साफ है कि आज भी भारी बहुमत में लोग अपनी ही जाति के दायरे के भीतर रहकर ही शादियां करते हैं.

प्यू रिसर्च के साल 2021 के एक सर्वे में जब लोगों से यह पूछा गया कि क्या महिलाओं को अपनी जाति से बाहर शादी करने से रोकना जरूरी है, तो इस पर 64 फीसदी लोगों ने हामी भरी. सिर्फ महिलाएं ही नहीं, पुरुषों के मामले में भी 62 फीसदी लोगों का यही मानना था कि उन्हें अपनी जाति से बाहर शादी करने से रोका जाना चाहिए.

ये आंकड़े इस कड़वी सच्चाई को बयां करते हैं कि शादी आज भी दो इंसानों का आपसी, स्वतंत्र और निजी फैसला नहीं, बल्कि समाज, परिवार और जाति की तथाकथित प्रतिष्ठा से जुड़ा एक बहुत बड़ा मुद्दा बना हुआ है.

गांवों में महिलाओं की जिंदगी कितनी आजाद?

गांव की पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था का सबसे गहरा और बुरा असर वहां की औरतों और लड़कियों की जिंदगी पर पड़ता है. उनके कपड़े पहनने के ढंग, घर से बाहर आने-जाने, किसी से हंसकर बात करने और अपने जीवनसाथी या करियर का चुनाव करने जैसे हर फैसले पर परिवार और समाज का कड़ा दबाव बना रहता है.

‘एनएफएचएस-5’ (NFHS-5) के आंकड़े बताते हैं कि 18 से 49 साल की उम्र की करीब 32 फीसदी शादीशुदा महिलाओं ने यह दर्द बयां किया कि उन्होंने अपनी जिंदगी में कभी न कभी पति की तरफ से शारीरिक, यौन या मानसिक हिंसा झेली है. घरेलू हिंसा के ये आंकड़े महिलाओं की सुरक्षा और उनकी सामाजिक स्थिति पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़े करते हैं.

महिलाओं की स्थिति पर सवाल: NFHS-5 के मुताबिक, 18 से 49 साल की करीब 32 फीसदी शादीशुदा महिलाओं ने पति की तरफ से शारीरिक, यौन या मानसिक हिंसा झेलने की बात कही.

इसी सर्वे के दौरान जब लोगों से यह पूछा गया कि क्या किसी परिस्थिति में पति का अपनी पत्नी पर हाथ उठाना सही ठहराया जा सकता है, तो 44 फीसदी पुरुषों और 45.4 फीसदी महिलाओं ने किसी न किसी वजह के तहत इसे सही मान लिया.

यह आंकड़ा वाकई झकझोर देने वाला है कि खुद महिलाओं के एक बड़े वर्ग के भीतर भी घरेलू हिंसा को सही ठहराने की मानसिकता बैठी हुई है. इसकी एक बड़ी वजह यह हो सकती है कि जो बेटियां बचपन से एक खास दमनकारी माहौल में बड़ी होती हैं, वे उसी व्यवस्था को अपनी जिंदगी का सामान्य नियम मान लेती हैं. कई बार वे उस बर्ताव को भी सही समझने लगती हैं, जो असल में सीधे तौर पर हिंसा और भेदभाव होता है.

बाल विवाह जैसी कुप्रथाएं भी इसी सामाजिक ढांचे का हिस्सा हैं. हालांकि 20 से 24 साल की उम्र की युवतियों में 18 साल से कम उम्र में शादी होने का आंकड़ा 26.8 फीसदी से घटकर अब 23.3 फीसदी पर आ गया है-यानी सुधार तो हुआ है; लेकिन बिहार, पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा जैसे कुछ राज्यों में यह आंकड़ा आज भी 40 फीसदी से ज्यादा बना हुआ है, जो गहरी चिंता का विषय है.

खेती से कितनी होती है कमाई ?

शहरों में बैठकर सोचने वालों को अक्सर ऐसा लगता है कि गांव में रहने पर रोजमर्रा के खर्च बहुत कम होते हैं और खेती-किसानी से अच्छी-खासी कमाई हो जाती है. लेकिन जमीन से जुड़े परिवारों की आर्थिक हकीकत इस काल्पनिक और रोमांटिक तस्वीर से कोसों दूर है.

साल 2019 के एक सरकारी सर्वे के मुताबिक, खेती करने वाले एक औसत ग्रामीण परिवार की महीने भर की कुल कमाई महज 10,218 रुपये थी. इसमें से खेती-किसानी से आने वाला हिस्सा सिर्फ 3,798 रुपये था, जबकि बाकी के 4,063 रुपये मजदूरी या दूसरे छोटे-मोटे कामों से आते थे.

खेती की आर्थिक हकीकत: एक खेती करने वाले परिवार की औसत मासिक आमदनी 10,218 रुपये थी. वहीं, करीब 50 फीसदी खेती करने वाले परिवार कर्ज में थे. उन पर औसतन 74,100 रुपये का कर्ज था.

इस सर्वे में यह भी खुलासा हुआ कि देश के लगभग आधे यानी 50 फीसदी किसान परिवार कर्ज के भारी बोझ तले दबे हुए हैं. इन परिवारों पर औसतन 74,100 रुपये का कर्ज था. इसके अलावा, अगर जमीन के औसत आकार की बात की जाए तो वह आधे हेक्टेयर यानी करीब सवा एकड़ से भी थोड़ा कम है.

इन तमाम आंकड़ों से बिल्कुल साफ हो जाता है कि खेती आज के समय में हर परिवार के लिए आर्थिक सुरक्षा की पक्की गारंटी नहीं बन सकती. खेतों की छोटी जोत, सीमित आमदनी और ऊपर से सिर पर कर्ज का भारी बोझ ग्रामीण परिवारों की रोजमर्रा की जिंदगी को बेहद संघर्षपूर्ण बना देता है.

इसलिए, सिर्फ यह सोचकर गांव में जमीन खरीद लेना कि वहां जाकर खेती करेंगे और आराम से गुजारा हो जाएगा, एक व्यावहारिक फैसला नहीं कहा जा सकता. ऐसा कोई भी कदम उठाने से पहले जमीन की गुणवत्ता, पानी की उपलब्धता, खेती की बढ़ती लागत, फसल का सही बाजार और कमाई के दूसरे विकल्पों पर गहराई से विचार करना जरूरी है.

गांवों में इलाज और स्वास्थ्य सुविधाओं का क्या हाल है?

रिटायरमेंट के बाद गांव में बसने का मन बनाने से पहले वहां की स्वास्थ्य व्यवस्थाओं का जायजा लेना सबसे जरूरी कदमों में से एक है. खासकर उन लोगों के लिए जो ढलती उम्र में गांव की शांत आबोहवा में रहने का सपना देखते हैं.

सरकार के ‘रूरल हेल्थ स्टैटिस्टिक्स’ के आंकड़े बताते हैं कि ग्रामीण इलाकों के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHCs) में स्पेशलिस्ट डॉक्टरों के कुल 21,964 पदों की सख्त जरूरत थी, लेकिन इनमें से सिर्फ 4,413 पदों पर ही डॉक्टर तैनात मिल पाए. इसका मतलब यह है कि गांवों में स्पेशलिस्ट डॉक्टरों के करीब 80 फीसदी पद खाली पड़े हैं.

ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की स्थिति: सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों के करीब 80 फीसदी पद खाली थे. यानी गांव में गंभीर बीमारी होने पर इलाज मिलना बड़ी चुनौती हो सकता है.

अगर अलग-अलग विभागों की बात करें तो सर्जन के 83 फीसदी, फिजीशियन के 82 फीसदी, बाल रोग विशेषज्ञों (पीडियाट्रिशियन) के 80 फीसदी और महिला रोग विशेषज्ञों के 74 फीसदी पद खाली पड़े हैं.

कुछ राज्यों की हालत तो इससे भी ज्यादा खराब है. मध्य प्रदेश में विशेषज्ञ डॉक्टरों की भारी किल्लत लगभग 94 फीसदी और गुजरात में करीब 88 फीसदी तक आंकी गई है.

अब जरा इस कड़वी सच्चाई को अपने रिटायरमेंट के सपने के साथ जोड़कर देखिए. जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, दिल की बीमारी, हड्डियों की तकलीफ, आंखों की दिक्कत या दूसरी गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं होने का खतरा बढ़ जाता है. ऐसे में गांव में घर बसाने से पहले यह सोचना बहुत जरूरी है कि वहां से किसी बड़े अस्पताल या आईसीयू (ICU) तक पहुंचने में कितने घंटों का सफर तय करना पड़ेगा. सिर्फ खूबसूरत नजारे और शांत माहौल देखकर गांव में रहने का फैसला करना खतरनाक साबित हो सकता है.

गांव में अपनापन भी है और चौबीसों घंटे की निगरानी भी

गांव की जिंदगी को सिर्फ आंकड़ों में पूरी तरह नहीं समेटा जा सकता, उसका एक ऐसा पहलू भी है जिसे महसूस करना पड़ता है. वह पहलू है ‘सामाजिक निगरानी’ का.

शहर की भागदौड़ भरी जिंदगी में पड़ोसी को शायद यह तक पता नहीं होता कि आप किससे मिल रहे हैं, घर कितनी देर से लौट रहे हैं या कहां जा रहे हैं. लेकिन इसके उलट, छोटे गांवों में हर शख्स की जिंदगी पर आस-पास के लोगों की कड़ी नजर रहती है. आपने आज क्या पहना है, आप किससे बात कर रहे थे और किसके साथ घूम रहे थे, ये सारी छोटी-छोटी बातें भी गांव में तुरंत चर्चा का विषय बन जाती हैं.

इस तरह की रोक-टोक और निगरानी का सामना ज्यादातर महिलाओं को करना पड़ता है. उनके उठने-बैठने, आने-जाने और निजी जीवन से जुड़े हर फैसले पर समाज का कड़ा पहरा रहता है.

बेशक, यह भी सच है कि गांव में हर किसी का अनुभव एक जैसा नहीं होता. अगर कोई व्यक्ति किसी सामाजिक और आर्थिक रूप से मजबूत रसूख वाले परिवार से ताल्लुक रखता है, तो गांव में हर कोई उसे जानता है और यह पहचान उसे एक गहरी सुरक्षा और अपनापन देती है. बीमारी या संकट के वक्त पूरा गांव मदद के लिए खड़ा हो जाता है.

लेकिन अगर कोई व्यक्ति किसी कमजोर पृष्ठभूमि से है और पहले से ही जातिगत भेदभाव या सामाजिक पाबंदियों को झेल रहा है, तो यही ग्रामीण व्यवस्था उसके लिए मदद का हाथ बढ़ाने के बजाय एक दमघोंटू निगरानी और लगातार दबाव का जरिया बन जाती है. यानी एक ही गांव में रहने वाले दो अलग-अलग इंसानों की जिंदगी जमीन-आसमान जितनी अलग हो सकती है.

क्या अब गांव बदल रहे हैं?

तस्वीर का दूसरा पहलू यह भी है कि गांवों में अब धीरे-धीरे बदलाव की बयार भी बह रही है और कुछ आंकड़े इस बात की गवाही भी देते हैं. बीते पांच सालों में बाल विवाह के मामलों में कमी आई है और यह आंकड़ा 26.8 फीसदी से घटकर 23.3 फीसदी पर आ गया है. इसके अलावा, पंचायती राज जैसे स्थानीय निकायों में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी भी पहले से बेहतर हुई है.

दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, देश भर के गांवों की स्थानीय सरकारों में करीब 14.5 लाख महिलाएं चुनी हुई प्रतिनिधि के तौर पर काम कर रही हैं. कुल निर्वाचित प्रतिनिधियों में महिलाओं की यह हिस्सेदारी लगभग 44 फीसदी तक पहुंच चुकी है.

बदलाव की एक उम्मीद: गांवों की स्थानीय सरकारों में करीब 14.5 लाख महिलाएं चुनी हुई प्रतिनिधि हैं. कुल निर्वाचित प्रतिनिधियों में महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 44 फीसदी बताई गई है.

गांवों में महिलाओं की इस सक्रिय मौजूदगी से इस बात की उम्मीद जगती है कि अब गांवों में पीने के पानी, साफ-सफाई, पक्की सड़कों और स्कूलों जैसी बुनियादी जरूरतों पर ज्यादा ध्यान दिया जाएगा. हालांकि, इसके साथ एक बड़ी व्यावहारिक समस्या आज भी बनी हुई है. कई जगहों पर महिला जनप्रतिनिधि सिर्फ नाम की होती हैं और असली फैसले उनके पति या घर के पुरुष सदस्य ही लेते हैं. इस अजीब प्रवृत्ति को आमतौर पर ‘प्रधान पति’ की संस्कृति कहा जाता है.

एक पुराने सर्वे में तो यह बात सामने आई थी कि पंजाब की करीब 75 फीसदी चुनी हुई महिला प्रतिनिधियों ने खुद यह माना था कि उनके सारे सरकारी कामकाज और फैसले उनके पति ही संभालते हैं.

इसका सीधा सा मतलब यह है कि महिलाओं को कागजों पर भले ही राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिल रहा है, लेकिन हुकूमत चलाने और असली फैसले लेने की पूरी ताकत अब भी उनके अपने हाथों में नहीं आ पाई है, जिसके लिए समाज को अभी और लंबा सफर तय करना बाकी है.

क्या शहर वाकई गांव से ज्यादा बेहतर हैं?

गांव की तमाम समस्याओं और कमियों को गिनाने का मतलब यह कतई नहीं है कि शहरों में सब कुछ एकदम सही और आदर्श है. जातिगत भेदभाव और छुआछूत की बीमारी शहरों में भी किसी न किसी रूप में आज भी जिंदा है.

‘इंडियन ह्यूमन डेवलपमेंट सर्वे’ के आंकड़े बताते हैं कि शहरों में रहने वाले 20 फीसदी परिवारों ने भी यह माना कि वे अपने घरों में छुआछूत मानते हैं. वहीं एक दूसरे सर्वे में जब शहरों के लोगों से पूछा गया कि क्या उन्हें अनुसूचित जाति का व्यक्ति अपने पड़ोसी के रूप में स्वीकार है, तो 78 फीसदी लोगों ने हां कहा, जबकि गांवों में यह समर्थन 69 फीसदी था.

यानी शहर और गांव के बीच सोच का फर्क तो जरूर है, लेकिन शहरों ने भी जातिगत भेदभाव के कलंक को पूरी तरह धोकर खत्म नहीं किया है. फर्क सिर्फ इतना है कि शहरों में यह भेदभाव कई बार छुपे तौर पर होता है, जिसका मतलब यह नहीं कि वह समस्या जड़ से खत्म हो चुकी है.

इसलिए बिना सोचे-समझे गांव को पूरी तरह से पिछड़ा और शहर को पूरी तरह से आधुनिक व प्रगतिशील मान लेना बिल्कुल गलत होगा. असलियत यह है कि गांव और शहर-दोनों ही जगहों की अपनी-अपनी अनूठी चुनौतियां और समस्याएं हैं.

गांव न तो कोई स्वर्ग है और न ही कोई नर्क

इसमें कोई दो राय नहीं है कि गांव की प्राकृतिक खूबसूरती पूरी तरह सच है. वहां के नीम के पेड़, मिट्टी के घरों की सौंधी खुशबू, चूल्हे पर बना ताजा खाना और लोगों का आपसी अपनापन कोई बनावटी बात नहीं है. लेकिन इस सुंदर तस्वीर के ठीक पीछे जातिगत व्यवस्था का भेदभाव, महिलाओं पर कड़े सामाजिक बंधन, खेती-किसानी की आर्थिक तंगी और बदहाल स्वास्थ्य सेवाएं जैसी कड़वी सच्चाइयां भी मजबूती से खड़ी हैं.

गांव को एक तरफ जहां सीधे ‘नर्क’ कह देना गलत होगा, वहीं बिना किसी सवाल के उसे ‘स्वर्ग’ मान लेना भी नासमझी होगी. किसी एक इंसान के लिए गांव प्यार, अपनेपन और सुरक्षा की जगह हो सकता है, तो वही गांव किसी दूसरे इंसान के लिए घुटन, भेदभाव और सामाजिक दबाव का सबब बन सकता है.

इसीलिए, गांव की तरफ लौटने का कोई भी बड़ा सपना देखने से पहले यह समझ लेना बहुत जरूरी है कि वहां की जिंदगी सिर्फ कुछ खूबसूरत पोस्टकार्ड जैसे नजारों से नहीं चलती. वहां की असली तस्वीर इस बात से तय होती है कि वहां का सामाजिक ढांचा कैसा है, आर्थिक स्थिति कैसी है, मेडिकल सुविधाएं कितनी दूर हैं और वहां रहने वाले आम इंसानों को कितनी आजादी हासिल है.

गांव न स्वर्ग है, न नर्क। किसी के लिए गांव अपनापन और सुरक्षा की जगह हो सकता है, तो किसी दूसरे के लिए वही जगह भेदभाव, निगरानी और सामाजिक दबाव का कारण बन सकती है.

-भारत एक्सप्रेस



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