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EXPLAINER: हिमालय में 40% बर्फ खत्म, 3 गुना बढ़ीं खतरनाक झीलें…; क्यों हिमालयी नदियों के मुहाने पर बसे इलाके हो रहे हैं तबाह?

Nepal Flash Flood: नेपाल में आई तबाही सिर्फ बारिश से नहीं आ सकती. वैज्ञानिकों का कहना है कि भोटेकोशी नदी में यह सैलाब एक बड़े हिमस्खलन के चलते आया है. तिब्बत में बुधवार की सुबह आए भूकंप ने एक ग्लेशियर को तोड़ दिया और यह ग्लेशियर आगे जाकर भोटेकोशी नदी की एक सहायक नदी के रास्ते को पूरी तरह ब्लॉक कर दिया.

Nepal Flash Flood

क्यों हिमालयी नदियों के मुहाने पर बसे इलाके हो रहे हैं तबाह?

Nepal Flash Flood: बुधवार की सुबह नेपाल की भोटेकोशी नदी अचानक उफान पर आ गई. चीन के तिब्बत से निकलने वाली इस नदी में आए सैलाब ने नेपाल की सीमा पर बसे तिमुरे और स्याफ्रुबेसी इलाकों को पूरी तरह तबाह कर दिया. गांव के गांव तबाह हो गए. पुल टूट कर बह गए और सड़कें दफन हो गईं. इस हादसे में अबतक 72 लोगों के मरने की पुष्टि हो चुकी है. वहीं 450 से अधिक लोग लापता बताये जा रहे हैं. इन लापता लोगों में 133 भारतीय हैं जो कैलाश-मानसरोवर यात्रा पर तिब्बत जा रहे थे.

वैज्ञानिकों का कहना है कि इतनी तबाही सिर्फ बारिश से नहीं आ सकती. भोटेकोशी नदी में यह सैलाब एक बड़े हिमस्खलन के चलते आया है. तिब्बत में बुधवार की सुबह आए भूकंप ने एक ग्लेशियर को तोड़ दिया और यह ग्लेशियर आगे जाकर भोटेकोशी नदी की एक सहायक नदी के रास्ते को पूरी तरह ब्लॉक कर दिया. थोड़ी देर में पानी का भारी दबाव बना और यह ब्लॉक टूट गया. जिससे थोड़ी ही देर में भारी मात्रा में पानी नदी में जा मिला. यह पहली बार नहीं है इससे पहले जुलाई 2025 में भी इसी नदी में सेम पैटर्न पर अचानक बाढ़ आई थी.

नेपाल की तरह भारत में भी साल 2025 में ऐसे ही फ्लैश फ्लड आया था. इसका पैटर्न भी लगभग वैसा ही था. खीर गंगा नदी के जल क्षेत्र में अचानक बादल फटने की वजह से पानी और मलबे का सैलाब पहाड़ों से नीचे उतरकर उत्तराखंड के धराली गांव में घुस गया था और घर-मकान से लेकर सड़कें और वाहन सब बहा ले गया. धराली में इससे पहले भी 1864, 2013 और 2014 में भी ऐसी घटनाएं दर्ज की गई थीं.

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उत्तरकाशी में बादल फटने के बाद एक गांव की स्थिति (फोटो- Bharat Express)

रिसर्च करने पर पता चलता है कि हिमालयी क्षेत्रों जैसे उत्तराखंड और नेपाल की ये घटनाएं एक पैटर्न का हिस्सा हैं. नदियों के संकरे पहाड़ी रास्तों पर बसे गांव और कस्बे में अचानक आई भयानक बाढ़ की चपेट में आ रहे हैं. दोनों घटनाओं को साथ रखकर देखें तो कुछ वजहें साफ नजर आती हैं. इन वजहों में भूगोल, जलवायु परिवर्तन और अनियोजित विकास शामिल हैं.

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उत्तरकाशी में बादल फटने के बाद एक पोस्ट हुआ तबाह (फोटो- Bharat Express)

भूगोल ही है असली कारण

नेपाल और उत्तराखंड के ये इलाके हिमालय के संकरी घाटियों में नदियों के ठीक मुहाने या संगम पर बसे हुए हैं. पहाड़ों से गिरने वाला पानी इन तंग रास्तों से एक ही दिशा में तेजी से निकलते हैं. इसलिए इन इलाकों में अचानक से भयंकर बाढ़ और विनाशकारी भूस्खलन आते हैं.

हिमालय दुनिया की सबसे नई (करीब 5 करोड़ साल पुरानी) और सबसे अस्थिर पर्वत श्रृंखला है, और यह अभी भी लगातार ऊपर उठ रही है क्योंकि भारतीय टेक्टोनिक प्लेट यूरेशियाई प्लेट से टकराती रहती है. इससे तीन समस्याएं पैदा होती हैं-

  • कच्ची और भुरभुरी चट्टानों का निर्माण: नई पर्वत श्रृंखला होने के कारण चट्टानें ठोस नहीं जमीं हैं, इसलिए भारी बारिश या भूकंप में आसानी से टूटकर भूस्खलन बनती हैं.
  • संकरी घाटियां और तेज ढलान: गांव-कस्बे अक्सर नदी के ठीक संगम या तंग घाटी में बसे हैं (जैसे धराली और रसुवा). यहां पानी एक ही रास्ते से ‘फनल’ होकर बहुत तेज रफ्तार से नीचे आता है.
  • भूकंप वाला इलाका: पूरा हिमालयी क्षेत्र भूकंप जोन-4 और जोन-5 में आता है. यही वजह है कि नेपाल में आई बाढ़ को लेकर वैज्ञानिक तिब्बत में आए भूकंप और हिमस्खलन से संबंध बता रहे हैं. भूविज्ञानी एस.पी. सती ने धराली जैसे गांवों को लेकर कहा था कि यह गांव एक ‘टिकिंग टाइम बॉम्ब’ पर बैठा है, क्योंकि यह इलाका बहुत ही अस्थिर भूगर्भीय क्षेत्र में स्थित है.
Nepal Bhote Koshi flash flood
नेपाल की भोटेकोशी नदी में बाढ़ आने से कई इलाके तबाह

जलवायु परिवर्तन ने ट्रिगर किया तबाही

विशेषज्ञों के मुताबिक जलवायु परिवर्तन की वजह से हिमालयी इलाकों में बादल फटने की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं. वातावरण गर्म होने की वजह से इन पहाड़ों पर मौजूद ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं. हिमस्खलन और भूस्खलन नदियों को अस्थाई रूप से रोक देते हैं. और जब यह बांध टूटता है तो बाढ़ बेहद विनाशकारी तरीके से आती है.

ICIMOD की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2000 के बाद से हिंदूकुश हिमालय (HKH) में ग्लेशियर का नुकसान दोगुना हो गया है. अगर ग्लोबल वार्मिंग इसी रफ्तार से बढ़ती रही तो सदी के अंत तक 70-80% ग्लेशियर गायब हो सकते हैं.

CSE की रिपोर्ट के अनुसार 2010-19 के दौरान हिमालयी ग्लेशियरों ने हर साल 0.28 मीटर वॉटर-इक्विवैलेंट बर्फ गंवाई, जबकि 2000-09 में यह दर सिर्फ 0.17 मीटर प्रति वर्ष थी. यानी नुकसान की रफ्तार करीब 65% बढ़ गई है. यहां तक कि सबसे स्थिर मानी जाने वाली काराकोरम रेंज में भी 2010-19 के दौरान हर साल 0.09 मीटर बर्फ का नुकसान दर्ज होने लगा. इस तरह से हिमालय अब तक अपनी 40% से ज्यादा बर्फ गंवा चुका है, और सदी के अंत तक यह आंकड़ा 75% तक पहुंच सकता है.

Nepal Bhote Koshi river flash flood
नेपाल में भटकोशी नदी में बाढ़ आने की तस्वीर

10 साल में तीन गुनी बढ़ी ग्लेशियल झीलें

उत्तराखंड और पूर्वी हिमाचल प्रदेश में ग्लेशियल झीलों की संख्या 2005 में 127 से बढ़कर 2015 में 365 हो गई. यानी सिर्फ 10 सालों में इन हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियल झीलों की संख्या लगभग तीन गुना बढ़ चुकी हैं. इन झीलों के अचानक फटने या उफनने से ही नीचे की बस्तियों में बड़ी तबाही आती है.

इन ग्लेशियरों के पिघलने से हिमालय में वनस्पति रेखा हर दशक 11 से 54 मीटर ऊपर खिसक रही है, जिससे 90% वर्षा-आधारित हिमालयी खेती के लिए संकट बढ़ रहा है.

ICIMOD की 2026 की रिपोर्ट बताती है कि इस बार हिमालय में सामान्य से 28% कम बर्फ गिरी. यह बीते 20 सालों में सबसे कम है. इससे गर्मियों में नदियों में पानी घटेगा और इलाके में सूखे की रफ्तार बढ़ेगी. इससे हिमालय क्षेत्र में रहने वाले करीब 26 करोड़ लोग सीधे प्रभावित होंगे. जबकि हिमालय से निकलने वाली नदियों पर एशिया की 50 करोड़ से ज्यादा आबादी निर्भर करती है.

विकास के नाम पर हो रहे दोहन ने बढ़ाया नुकसान

हिमालयन क्षेत्रों में होने वाली आपदाओं पर रिसर्च करने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि इन इलाकों में अनियोजित विकास ने नुकसान को बढ़ा दिया है. नदियों के अफवाह क्षेत्रों में होटल, बाजार और घर बनाये जा रहे हैं. जिससे बाढ़ के रास्ते में आबादी बस गई है. जब आपदा आती है तो इनके पास जान बचाने के लिए समय ही नहीं होता.

इस तरह की तबाही सिर्फ भारत या नेपाल तक ही सीमित नहीं है. पिछले कुछ महीनों में हिमालयन क्षेत्रों में आपदाओं की झड़ी लग गई है. पाकिस्तान में भी भारी बारिश और ग्लेशियर पिघलने से आई बाढ़-भूस्खलन में 300 से ज्यादा लोगों ने अपनी जान गंवा दी. ये सभी घटनाएं एक ही पैटर्न पर हो रही हैं. गर्म होती जलवायु, हिमालय का अस्थिर भूगोल और नदी-किनारे बढ़ती आबादी का मेल हर जगह तबाही मचा रहा है.

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उत्तरकाशी में बादल फटने के बाद आई बाढ़ की तस्वीर

हिमालयी क्षेत्रों में 5 सालों में आपदाओं की संख्या बढ़ी

साल 2013 से 2022 के बीच भारत में हुई कुल आपदाओं में से 44% अकेले हिमालयी क्षेत्र में हुईं. इस दौरान बाढ़, भूस्खलन और आंधी-तूफान की कुल 192 घटनाएं दर्ज हुईं. जबकि अप्रैल 2021 से अप्रैल 2022 के बीच देशभर में दर्ज 41 भूस्खलनों में से 38 हिमालयी राज्यों में हुए, जिनमें सिक्किम में अकेले 11 घटनाएं दर्ज की गईं.

साल 2013 में केदारनाथ में बादल फटने की वजह से आई आपदा में 6,000 से अधिक लोगों की मौत हुई और 4500 गांव इससे प्रभावित हुए थे. इन गांवों में अधिकतर पूरी तरह नष्ट हो गये थे. केदारनाथ आपदा को अब तक की सबसे भीषण हिमालयी आपदाओं में गिना जाता है.

साल 2023 में नेपाल में ही भूस्खलन में 52 लोगों की मौत हुई थी, जबकि 29 लोग लापता हो गए थे.

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वैज्ञानिकों का मानना है कि इलाके का भूगोल यह तय करता है कि आपदा कहां आएगी, तो वहीं जलवायु परिवर्तन यह तय करता है कि आपदा कितनी बार और कितनी तेज आएगी. क्योंकि जलवायु परिवर्तन की वजह से जहां तेजी से ग्लेशियर पिघल रहे हैं, वहीं हिमालय के ऊपरी इलाकों में तेजी से ग्लेशियर वाली झीलों का निर्माण हो रहा है. ऐसे में जब ये झीलें टूटती हैं तो नदियों के किनारे बसी बस्तियों को भयंकर नुकसान पहुंचाती हैं.

-भारत एक्सप्रेस



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