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मोबाइल कॉल के लिए देने पड़ते थे 24 रुपये! जानिए कैसे इंटरनेट ने बदली 140 करोड़ भारतीयों की किस्मत

World Telecommunication Day 2026: विश्व दूरसंचार दिवस के अवसर पर भारत की डिजिटल यात्रा का विश्लेषण. 1995 में पहली मोबाइल कॉल और VSNL के इंटरनेट से लेकर Jio, UPI और ‘डिजिटल इंडिया’ तक के सफर को सुबिमल भट्टाचार्जी की पुस्तक ‘The Digital Decades’ में बेहद बारीकी से दर्शाया गया है.

The Digital Decades Subimal Bhattacharjee
Edited by Shubhra Rai

World Telecommunication Day 2026: विश्व दूरसंचार दिवस (World Telecommunication Day) के अवसर पर सुबिमल भट्टाचार्जी की पुस्तक ‘The Digital Decades’ भारत में इंटरनेट के 30 वर्षों के परिवर्तनकारी सफर को उजागर करती है. यह 1995 की पहली मोबाइल कॉल से लेकर आज के ‘डिजिटल इंडिया’ तक के नीतिगत और तकनीकी विकास का विस्तृत विवरण है.

यह पुस्तक भारत के डिजिटल पावरहाउस बनने की कहानी है, जिसमें ₹24 प्रति मिनट की कॉल से लेकर दुनिया के सबसे सस्ते डेटा और UPI जैसी क्रांतियों को शामिल किया गया है. लेखक ने इसमें भविष्य की चुनौतियों जैसे AI और डेटा सुरक्षा पर भी गहराई से चर्चा की है.

 कनेक्टिविटी का महापर्व

आज पूरा विश्व ‘वर्ल्ड टेलीकम्युनिकेशन डे’ मना रहा है. यह दिन हमें याद दिलाता है कि कैसे दूरसंचार तकनीकों ने दूरियों को खत्म कर पूरी दुनिया को एक धागे में पिरोया है. भारत के संदर्भ में यह दिन और भी खास हो जाता है, क्योंकि पिछले तीन दशकों में हमने बैलगाड़ी से लेकर हाई-स्पीड 5G तक का डिजिटल सफर तय किया है.

1995: वह ऐतिहासिक कॉल और इंटरनेट का उदय

भारत की डिजिटल गाथा का सबसे अहम मोड़ अगस्त 1995 था. सुबिमल भट्टाचार्जी की किताब ‘The Digital Decades’ इसी दौर से शुरू होती है. 31 जुलाई 1995 को तत्कालीन केंद्रीय मंत्री सुखराम ने कोलकाता के मुख्यमंत्री ज्योति बसु को देश की पहली मोबाइल कॉल की थी.

उस समय मोबाइल पर बात करना एक विलासिता थी, जिसकी कीमत 24 रुपये प्रति मिनट हुआ करती थी. उसी साल VSNL ने पहली बार पब्लिक इंटरनेट सेवा की शुरुआत की, जिसने डायल-अप मॉडम और साइबर कैफे के एक नए युग को जन्म दिया.

पॉलिसी से लेकर इनोवेशन तक: 19 अध्यायों का सफर

भट्टाचार्जी ने अपनी पुस्तक को 19 अध्यायों में बांटकर भारत के डिजिटल विकास को चार प्रमुख चरणों में समझाया है:

  • उदारीकरण (1990 के दशक): जब नीतियों में बदलाव हुआ और डॉट-कॉम का शुरुआती बूम आया.
  • स्मार्टफोन युग (2000 के बाद): 3G तकनीक और iPhone के आने से इंटरनेट लोगों की जेब तक पहुंचा.
  • डेटा क्रांति (2010 का दशक): आधार (Aadhaar) का विस्तार, Jio का आगमन और डेटा की कीमतों में दुनिया की सबसे बड़ी गिरावट.
  • डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI): UPI की वैश्विक सफलता और ‘डिजिटल इंडिया’ मिशन जिसने कोविड काल में देश को थामे रखा.

भारत का अनोखा ‘हाइब्रिड मॉडल’

लेखक के अनुसार, भारत का डिजिटल मॉडल दुनिया में सबसे अलग है. यह न तो अमेरिका की तरह पूरी तरह बाजार आधारित है और न ही चीन की तरह पूरी तरह सरकारी नियंत्रण वाला. भारत ने ‘इंडिया स्टैक’ के जरिए आधार और UPI जैसे सिस्टम को ‘पब्लिक गुड’ (जनहित) के रूप में विकसित किया है. आज 90 करोड़ से ज्यादा इंटरनेट यूजर्स के साथ भारत न केवल तकनीक का उपभोक्ता है, बल्कि एक वैश्विक डिजिटल आर्किटेक्ट भी बन चुका है.

भविष्य की चुनौतियां: एक्सेस से ऑटोनॉमी तक

किताब सिर्फ इतिहास नहीं बताती, बल्कि भविष्य की चुनौतियों को भी बताती है. जैसे AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस), साइबर सुरक्षा और डेटा संप्रभुता (Data Sovereignty) पर भी रोशनी डालती है. लेखक का मानना है कि अब समय ‘एक्सेस’ से आगे बढ़कर ‘कंट्रोल और स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी’ का है. ‘The Digital Decades’ उन सभी के लिए एक मार्गदर्शिका है जो यह समझना चाहते हैं कि कैसे एक विकासशील देश दुनिया का डिजिटल पावरहाउस बन गया.

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-भारत एक्सप्रेस 



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