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उस्ताद अमजद अली ख़ाँ को ‘मेमोरियल बिस्मिल्लाह ख़ाँ सम्मान’ से किया गया सम्मानित, याद-ए-बिस्मिल्लाह में गूंजी शहनाई की अमर धुन

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA) में आयोजित ‘याद-ए-बिस्मिल्लाह’ कार्यक्रम में शहनाई सम्राट भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ाँ को संगीतमय श्रद्धांजलि दी गई. इस अवसर पर उस्ताद अमजद अली ख़ाँ को ‘द मेमोरियल बिस्मिल्लाह ख़ाँ सम्मान’ से नवाज़ा गया.

Yaad-e-Bismillah
Edited by Akansha

नई दिल्ली: भारतीय शास्त्रीय संगीत की समृद्ध विरासत को समर्पित एक ऐतिहासिक संध्या ने 20 अगस्त बुधवार शाम इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA) के मंच को संगीत और श्रद्धा से सराबोर कर दिया. ‘याद-ए-बिस्मिल्लाह’ नामक इस गरिमामयी कार्यक्रम का आयोजन शहनाई सम्राट और भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ाँ की स्मृति को श्रद्धांजलि देने के लिए किया गया, जिसने संगीत जगत के दिग्गज कलाकारों और राष्ट्रीय नेतृत्व को एक मंच पर एकत्रित किया.

एक प्रतिष्ठित सम्मान का साक्षी बना ऐतिहासिक क्षण

इस अविस्मरणीय शाम के केंद्र में था ‘द मेमोरियल बिस्मिल्लाह ख़ाँ सम्मान’ का विधिवत समर्पण. केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री श्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने यह प्रतिष्ठित सम्मान विश्वविख्यात सरोद वादक और पद्म विभूषण उस्ताद अमजद अली ख़ाँ को प्रदान किया. इस गहरे सम्मान को प्राप्त करने पर भावुक उस्ताद अमजद अली ख़ाँ ने कहा, “यह एक गहरा सम्मान है. मुझे उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ाँ के साथ मंच साझा करने का सौभाग्य दो बार मिला, वे यादें हमेशा मेरे साथ हैं. उनकी संगीतिक विरासत हम सभी के लिए एक मार्गदर्शक है.”

बिस्मिल्लाह ख़ाँ की विरासत को श्रद्धांजलि

यह कार्यक्रम पद्म श्री डॉ. सोमा घोष, जो बनारस घराने की प्रख्यात गायिका हैं, के नेतृत्व में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA) के सहयोग से आयोजित किया गया. इसका उद्देश्य उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ाँ की उस अमिट संगीतिक विरासत को श्रद्धांजलि देना था, जिसने शहनाई की मधुर तान को देश-दुनिया में अमर कर दिया और भारतीय संगीत को अंतर्राष्ट्रीय पहचान दिलाई.

संगीत का एक दुर्लभ और मंत्रमुग्ध कर देने वाला संगम

कार्यक्रम का musical segment अत्यंत विशेष और दुर्लभ था. सबसे पहले, श्री लोकेश आनंद और अफ़ाक़ बिस्मिल्लाह ख़ाँ ने शहनाई की मधुर स्वर लहरियों से समां बांधा. इसके बाद का दृश्य दर्शकों के लिए एक सुखद आश्चर्य था जब विश्वविख्यात तबला वादक उस्ताद ज़ाकिर हुसैन ने उनके साथ जुगलबंदी की, जिसने पूरे सभागार को मंत्रमुग्ध कर दिया. शहनाई और तबले की इस अनूठी संगत ने उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ाँ की यादों को ताजा कर दिया.

बनारस घराने की गायन परंपरा का शानदार प्रदर्शन

इसके पश्चात, डॉ. सोमा घोष ने अपने मख़मली और भावपूर्ण स्वर से बनारस घराने की गायन परंपरा का जीवंत प्रदर्शन किया. उनके गायन में क़व्वाली और ठुमरी की जो बारीकियाँ थीं, उन्होंने श्रोताओं को भावविभोर कर दिया और उनकी तालियाँ गूंजती रहीं. उनकी प्रस्तुति ने साबित कर दिया कि भारतीय शास्त्रीय संगीत की जड़ें कितनी गहरी और समृद्ध हैं.

सांस्कृतिक एकता का संदेश

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए केंद्रीय मंत्री श्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने कहा कि उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ाँ सिर्फ़ एक संगीतकार ही नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की एकता और अखंडता के प्रतीक थे. उनकी शहनाई में गंगा-जमुनी तहज़ीब की सुगंध थी, जो #CultureUnitesAll के संदेश को सच्चे अर्थों में चरितार्थ करती है. उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन देश की सांस्कृतिक विरासत को संजोने और आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने का काम करते हैं.

एक अमिट छाप छोड़ता कार्यक्रम

निस्संदेह, ‘याद-ए-बिस्मिल्लाह’ की यह संध्या केवल एक स्मृति समारोह नहीं, बल्कि भारतीय शास्त्रीय संगीत की समृद्ध परंपरा को आगे बढ़ाने और उसे नई पीढ़ी तक पहुँचाने का एक सशक्त प्रयास था. यह वह शाम थी जब दिल्ली की रातें एक बार फिर बिस्मिल्लाह ख़ाँ की अमर शहनाई की स्वर लहरियों से गूँज उठीं और संगीत प्रेमियों के दिलों में एक अमिट छाप छोड़ गईं. यह आयोजन सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण और प्रसार में सरकार के प्रयासों का एक उज्ज्वल उदाहरण बन गया.

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-भारत एक्सप्रेस 



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