एक दौर था जब भारतीय राजनीति में कांग्रेस का दबदबा था. सत्ता की राजनीति हो या संगठन की ताकत, हर नेता कांग्रेस के साथ खड़ा दिखाई देता था. लेकिन समय बदला, मतभेद बढ़े और कई बड़े नेताओं ने कांग्रेस से अलग होकर अपनी-अपनी राजनीतिक पार्टियां बना लीं. कुछ दलों ने क्षेत्रीय राजनीति में बड़ी सफलता भी हासिल की, लेकिन आज कई ऐसे दल अस्तित्व और प्रभाव की चुनौती से जूझ रहे हैं. सवाल यह है कि क्या कांग्रेस से अलग होकर बने दलों का राजनीतिक सफर अब फिर उसी कांग्रेस के सहारे की तलाश में है?
भारतीय राजनीति में कांग्रेस कभी वह विशाल बरगद थी, जिसकी छांव में देश के अधिकांश बड़े नेता खड़े नजर आते थे. लेकिन जैसे-जैसे संगठन में मतभेद बढ़े, कई नेताओं ने अपनी अलग राजनीतिक राह चुनी. किसी ने क्षेत्रीय अस्मिता को मुद्दा बनाया, तो किसी ने नेतृत्व और विचारधारा के नाम पर नई पार्टी खड़ी की. शुरुआत में इन दलों को जनता का भरपूर समर्थन मिला और कई राज्यों में उन्होंने कांग्रेस की जगह भी ले ली.
बदलते वक्त के साथ अब इन पार्टियों की कांग्रेस में विलय की चर्चा तेज है. 2024 लोकसभा चुनाव के बाद शरद पवार गुट वाली NCP को लेकर चर्चा चली की कांग्रेस ने शरद पवार के सामने विलय का प्रस्ताव रखा है.
अब टीएमसी को लेकर यही चर्चा है कि TMC को कांग्रेस में विलय कर लेना चाहिए. समय बताएगा राहुल कितना मोल भाव कर पाते है और 2029 लोकसभा चुनाव से पहले का कांग्रेस कैसी होगी.
शरद पवार – साल 1999 में शरद पवार ने विदेशी मूल के मुद्दे पर कांग्रेस से अलग होकर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी यानी एनसीपी का गठन किया. महाराष्ट्र की राजनीति में एनसीपी लंबे समय तक एक प्रभावशाली ताकत बनी रही. केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर पार्टी सत्ता का हिस्सा रही. लेकिन समय के साथ पार्टी में आंतरिक संघर्ष बढ़ा और विभाजन ने उसकी ताकत को कमजोर कर दिया. आज एनसीपी का मूल संगठन पहले जैसा प्रभाव नहीं रखता और उसका राजनीतिक दायरा काफी सीमित हो चुका है.
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने कांग्रेस छोड़कर तृणमूल कांग्रेस बनाई. तृणमूल कांग्रेस ने न सिर्फ कांग्रेस को पीछे छोड़ा बल्कि तीन दशक से ज्यादा समय तक सत्ता में रही वामपंथी सरकार को भी उखाड़ फेंका. हालांकि हाल के वर्षों में पार्टी को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा है. भ्रष्टाचार के आरोप, नेताओं का पलायन और भाजपा की बढ़ती चुनौती ने तृणमूल की राजनीतिक राह को कठिन बनाया है. फिर भी पश्चिम बंगाल में वह अब भी प्रमुख शक्ति बनी हुई है.
जगन मोहन रेड्डी आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी ने कांग्रेस से अलग होकर वाईएसआर कांग्रेस पार्टी बनाई. पार्टी ने बेहद कम समय में बड़ी सफलता हासिल की और 2019 में भारी बहुमत के साथ सत्ता पर कब्जा कर लिया. लेकिन 2024 के चुनावों के बाद राजनीतिक समीकरण बदले और पार्टी को बड़ा झटका लगा. सत्ता से बाहर होने के बाद संगठन और जनाधार को बनाए रखने की चुनौती उसके सामने खड़ी है.
सिर्फ यही नहीं, देश में कई अन्य दल भी ऐसे हैं जिनकी जड़ें कभी कांग्रेस में रही हैं. कुछ ने क्षेत्रीय राजनीति में अपनी मजबूत पहचान बनाई, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर प्रभाव कायम रखना आसान नहीं रहा. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस से अलग होकर नई पार्टी बनाना जितना कठिन है, उससे कहीं ज्यादा मुश्किल लंबे समय तक संगठन को मजबूत बनाए रखना है.
हालिया दौर में भी कई कांग्रेस के दिग्गज नेता पार्टी छोड़ भाजपा के साथ हो लिए.
- ज्योतिरादित्य सिंधिया
- जतिन प्रसाद
- आरपीएन सिंह
- जगदंबिका पाल
- सुष्मिता देव
- अशोक चव्हाण
- रवनीत बिट्टू
- मिलिंद देवरा
- संजय सिंह
जैसे नामों की लंबी फेहरिस्त है,आने वाला वक्त बताएगा इनका कांग्रेस प्रेम ज्यादा मजबूत हैं या अवसरवाद की राजनीति. कांग्रेस से अलग होकर बने कई राजनीतिक दलों ने अपने समय में बड़ी सफलताएं हासिल कीं और कुछ ने तो कांग्रेस की जगह भी ले ली. लेकिन राजनीति में सिर्फ करिश्माई नेतृत्व नहीं, मजबूत संगठन भी जरूरी होता है. यही वजह है कि कई क्षेत्रीय दल आज नए राजनीतिक सहारों और गठबंधनों की तलाश में नजर आते हैं.
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