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माता-पिता के झगड़े में न पिसें बच्चे, दिल्ली हाई कोर्ट का अहम आदेश

दिल्ली हाई कोर्ट ने बच्चों के हितों से जुड़े एक अहम फैसले में साझा पालन-पोषण (Joint Parenting) को लेकर दिशा-निर्देश तैयार करने का आदेश दिया है. कोर्ट ने बढ़ते तलाक और माता-पिता के अलगाव के मामलों को देखते हुए राज्य को व्यापक गाइडलाइंस बनाने की जरूरत बताई है. यह आदेश बच्चों की अभिरक्षा से जुड़े मामलों में न्यायालयों और माता-पिता दोनों के लिए मार्गदर्शक साबित हो सकता है.

Delhi-high-court

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दिल्ली हाई कोर्ट ने साझा पालन-पोषण को लेकर दिशा-निर्देश तैयार करने का निर्देश दिया है. यह आदेश चाइल्ड राइट्स एनजीओ आयुष्मान इनिशिएटिव फॉर चाइल्ड राइट्स और एकम न्याय फाउंडेशन द्वारा दायर जनहित याचिका पर दिया गया. याचिका में पारिवारिक न्यायालयों को बाल अभिरक्षा मामलों के निपटारे में सहायता के लिए गाइडलाइंस बनाने की मांग की गई थी. सुनवाई के दौरान कोलकाता और कर्नाटक हाई कोर्ट द्वारा पहले से जारी गाइडलाइंस का हवाला दिया गया, जिन्हें महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने भी मान्यता दी है. कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को दो सप्ताह के भीतर रजिस्ट्री से संपर्क करने को कहा है. एनजीओ प्रतिनिधियों ने कहा कि तलाक और कस्टडी विवादों में बढ़ोतरी के कारण बच्चे मानसिक और भावनात्मक पीड़ा का शिकार हो रहे हैं, ऐसे में पालन-पोषण बच्चों के हित में अहम भूमिका निभा सकता है.

जनहित याचिका पर हाई कोर्ट का निर्देश

दिल्ली हाई कोर्ट ने साझा-पालन पोषण को लेकर दिशा निर्देश तैयार करने का आदेश दिया है. कोर्ट ने कहा कि पालन-पोषण और माता-पिता के अलगाव के बढ़ते मामलों को देखते हुए राज्य के लिए व्यापक दिशा निर्देश तैयार करने को कहा है. यह जनहित याचिका चाइल्ड राइट्स एनजीओ आयुष्मान इनिशिएटिव फॉर चाइल्ड राइट्स और एकम न्याय फाउंडेशन द्वारा संयुक्त रूप से दायर की गई थी.

पहले से लागू गाइडलाइंस को अपनाने की दलील

दायर याचिका में पारिवारिक न्यायालयों को बाल अभिरक्षा मामलों के निपटारे में सहायता देने के लिए दिशा निर्देश बनाने की मांग की गई थी. मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने चाइल्ड एंड कस्टडी गाइडलाइंस और पेरेंटिव प्लान 2005 को हवाला देते हुए कहा कि कोलकाता हाई कोर्ट द्वारा इसको लेकर दिशा निर्देश दिया गया था और उसी तर्ज पर कर्नाटक हाई कोर्ट ने भी दिया.

मानसिक पीड़ा और भावनात्मक अलगाव का शिकार बनते बच्चें

इन हाई कोर्ट द्वारा जारी दिशा निर्देशों को महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा भी मान्यता दे दी है. दिल्ली हाई कोर्ट ने याचिककर्ताओ की मांग को स्वीकार करते हुए उन्हें 2 सप्ताह के भीतर रजिस्ट्री से संपर्क करने को कहा है. इसपर एकम न्याय फाउंडेशन की निदेशक दीपिका नारायण भारद्वाज और एआईएफसीआर के संस्थापक अरिजीत मिश्रा ने कहा कि हाल के वर्षो में समाज मे तलाक के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी देखने को मिली है. जिसके चलते बच्चों की कस्टडी को लेकर माता-पिता के बीच कड़वे और लंबी कानूनी लड़ाइयां देखने को मिल रही है.

हालांकि, इन संघर्षों में बच्चे अक्सर मोहरे बन जाते है और अंततः अपने किसी एक माता-पिता से दूर हो जाते है. ऐसे मामलों में कई बच्चे मानसिक पीड़ा और भावनात्मक अलगाव का शिकार होते हैं.

जनहित याचिका दायर की

देश, विशेष रूप से राजधानी दिल्ली में तलाक और कस्टडी विवादों की बढ़ती संख्या को देखते हुए हमने यह जनहित याचिका दायर की. जिसपर दिशा निर्देशों के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया. ये दिशा निर्देश न केवल न्यायालयों को दिशा देंगे, बल्कि माता-पिता को भी साझा पालन पोषण के महत्व को समझने में मदद करेगा.

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-भारत एक्सप्रेस

Edited By: Shubhra Rai (Intern)



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