दिल्ली हाई कोर्ट ने सशस्त्र बलों के जवानों और अधिकारियों के मामले में एक बड़ा फैसला दिया है. कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया है कि अगर कोई सैनिक या सेना के अधिकारी भर्ती के समय पूरी तरह से स्वस्थ्य है और सेवा के दौरान कोई बीमारी हो जारी है कि उस बीमारी को सैन्य सेवा से जुड़ा हुआ माना जाएगा.
यह आदेश सी हरिशंकर और जस्टिस ओम प्रकाश शुक्ला की पीठ ने मामले में सुनवाई के बाद दिया है.
साबित करें कि बीमारी ड्यूटी के कारण हुई
कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में जवान या अधिकारी पर यह जिम्मेदारी नहीं होगी कि वह साबित करें कि बीमारी ड्यूटी के कारण हुई है, बल्कि यह दायित्व सरकार या नियोक्ता का होगा कि ठोस कारणों के साथ दिखाए कि बीमारी का सेना की सेवा से कोई संबंध नही है.
बता दें कि यह मामला वायुसेना के एक पूर्व वारंट ऑफिसर से जुड़ा हुआ है. जिन्होंने लगभग 38 साल तक देश की सेवा की. भर्ती के समय उन्होंने मेडिकल डिक्लरेशन दिया था और पूरी तरह से स्वस्थ पाए गए थे. लेकिन सेवा के दौरान उन्हें प्राइमरी हाइपरटेंशन की बीमारी हो गई. मेडिकल बोर्ड ने उनकी अक्षमता 30 फीसदी आंकी, लेकिन पेंशन देने से इनकार कर दिया.
डिसेबिलिटीज पेंशन देने का दिया आदेश
बोर्ड का कहना था कि बीमारी पीस स्टेशन पर हुई और इसका सेना की सेवा से कोई संबंध नहीं है. जिसके पूर्व वारंट ऑफिसर ने इस फैसले को चुनौती दी. आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल ने उनके पक्ष में निर्णय देते हुए डिसेबिलिटीज पेंशन देने का आदेश दिया. जिसके खिलाफ केंद्र सरकार ने आदेश को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी गई थी. जिसे खारिज करते हुए कोर्ट ने ट्रिब्यूनल के फैसले को सही ठहराया है.
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि भर्ती के समय हर सैनिक को स्वास्थ माना जाता है. अगर सेवा के दौरान बीमारी आती है, तो इसे सैन्य सेवा से जुड़ा हुआ ही समझा जाएगा. कोर्ट ने इस मामले में टिप्पणी करते हुए कहा कि डिसेबिलिटी पेंशन एक लाभकारी प्रावधान है और इसे हमेशा सैनिकों के हित में पढ़ा जाना चाहिए. यानी कि अदालत ने यह साफ कर दिया कि ऐसे मामलों में जवानों के पक्ष को प्राथमिकी दी जाए.
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-भारत एक्सप्रेस
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