कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि प्रक्रियाओं में स्पष्टता का अभाव, पहचान दस्तावेजों पर जोर और अल्ट्रासाउंड जैसी आवश्यक चिकित्सा जांच में देरी ने इस मामले में पीड़िता की परेशानी को और बढ़ा दिया है.
इस तरह के मामलों में संवेदनशील दृष्टिकोण की जरूरत है
दिल्ली हाईकोर्ट ने 29 मई के अपने आदेश में कहा कि अस्पतालों और चिकित्सा संस्थानों को इस तथ्य के प्रति संवेदनशील बनाया जाना चाहिए कि यौन उत्पीड़न की पीड़िताओं, विशेषकर नाबालिग लड़कियों से जुड़े मामलों में अधिक जिम्मेदार और संवेदनशील दृष्टिकोण की जरूरत होती है.
कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि चिकित्सा प्रोटोकॉल केवल कानूनी आवश्यकताओं का पालन तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उन्हें सहानुभूति, व्यावसायिक सोच और यौन हिंसा के पीड़ित लोगों द्वारा झेली जाने वाली विशिष्ट कठिनाइयों की गहरी समझ से भी निर्देशित होना चाहिए.
कोर्ट एक 17 वर्षीय नाबालिग लड़की के मामले में सुनवाई के बाद यह फैसला दिया है. लड़की को एम्स में गर्भपात के कराने के दिक्कत हुई थी. पहचान पत्र के चलते 24 सप्ताह से अधिक गर्भावस्था के कारण जांच रुक गई थी. जिसके बाद यह मामला हाईकोर्ट पहुचा था.
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-भारत एक्सप्रेस
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