दिल्ली हाई कोर्ट से आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता और दिल्ली के पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को बड़ी राहत मिल गई है. अदालत ने सिसोदिया के 2020 के विधानसभा चुनाव जीतने के खिलाफ दायर अपील को खारिज कर दिया है.
फैसले में दखल देने से कोर्ट का इनकार
याचिकाकर्ता प्रताप चंद्रा ने सिंगल जज के आदेश को चुनौती दी थी, जिसने 17 जनवरी 2026 को चुनाव याचिका खारिज कर दिया था. साथ ही कोर्ट ने पहले के फैसले में दखल देने से इनकार कर दिया है. इससे पहले याचिका को खारिज करते हुए जस्टिस मनमीत सिंह ने कहा था कि यह तभी होता है, जब आरोप तय हो जाते हैं, या कोर्ट द्वारा अपराध का संज्ञान लिया जाता है, तभी खुलासा करने की कानूनी जिम्मेदारी आती है.
बता दें कि इस याचिका से प्रतिद्वंद्वी राष्ट्रीय राष्ट्रवादी पार्टी के उम्मीदवार प्रताप चंद्र ने आरोप लगाया था कि सिसोदिया ने चुनावी नियमों का उल्लंघन किया और अपने नामांकन पत्र में एक पुरानी एफआईआर की जानकारी छुपाई. अदालत ने कहा था कि याचिकाकर्ता आरोपों के समर्थन में कोई पुख्ता सबूत पेश नहीं कर पाया.
क्या था मामला?
मनीष सिसोदिया ने पडपडगंज सीट पर 70163 पाकर जीत हासिल की थी, जबकि प्रताप चंद्र को मात्र 95 वोट मिले थे. प्रताप चंद्र ने आरोप लगाया कि मनीष सिसोदिया ने चुनाव प्रचार और चुनावी सामग्री का प्रदर्शन मतदान खत्म होने से पहले 48 घंटे की प्रतिबंधित अवधि के दौरान जारी रखा. साथ ही चंद्र ने यह भी आरोप लगाया कि मनीष सिसोदिया ने 2013 में राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम 1971 के तहत अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर की जानकारी नहीं दी, जी जरूरी तथ्यों को दबाने के बराबर है.
वोटर को पता हो आपराधिक पृष्ठभूमि
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि चुनाव लड़ रहे उम्मीदवार की आपराधिक पृष्ठभूमि बताने का मकसद यह पक्का करना है कि वोटर को ऐसी पृष्ठभूमि के बारे में पता हो, ताकि वोटर अपने मताधिकार का इस्तेमाल करते समय सोच-समझकर चुनाव कर सकें.
कोर्ट ने कहा कि रेस्पोडेंट की तरफ से जानकारी दिखाने के लिए ऐसी कोई दलील या मटीरियल न होने पर, एफआईआर का खुलासा न करने को जानबूझकर छिपाना नहीं माना जा सकता, ताकि सजा या चुनावी नतीजे भुगतने पड़े.
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-भारत एक्सप्रेस
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