सुप्रीम कोर्ट और देशभर के हाई कोट्स में जनहित याचिका दाखिल करने की बाढ़ आ गई है. अब अदालतों को भी लगने लगा है कि यह न्यायिक समय की बर्बादी है. क्योंकि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट कई बार कहा चुका है कि यह जनहित याचिका पब्लिसिटी स्टंट है. जनहित याचिका दायर करने का कई मुख्य कारण भी है. लोगों को अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ी है, जिससे वे अदालतों का सहारा लेने लगे हैं.
जनहित याचिका के माध्यम से सरकार और प्रशासन की जवाबदेही सुनिश्चित करने की प्रवृत्ति बढ़ी है. साथ ही पर्यावरण संरक्षण, मानवाधिकार, और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों पर जनहित याचिका के माध्यम से अदालतों में मुकदमों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है. इसका एक कारण यह भी है कि जनहित याचिका दायर करने की प्रक्रिया सरल और सुलभ होने के कारण अधिक लोग इसका इस्तेमाल करने लगे है. कई बार अदालतों ने जनहित याचिका के माध्यम से सामाजिक न्याय और अधिकारों की रक्षा की. साथ अदालतों ने मौलिक अधिकारों की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका भी निभाई है. जिसके चलते न्यायपालिका की भूमिका और प्रभाव बढ़ा है, जिससे सुप्रीम कोर्ट विश्व की सबसे शक्तिशाली न्यायपालिकाओं में से एक बन गया है.
साल 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक विधानसभा के विस्तार में दाखिल जनहित याचिका पर नाराजगी जाहिर करते हुए सामाजिक कार्यकर्ता टीजे अब्राहम को जनहित याचिका के सिद्धांत के दुरुपयोग का दोषी बताते हुए 25 लाख रुपए का जुर्माना लगाया था. सामाजिक कार्यकर्ता टीजे अब्राहम ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल कर कर्नाटक सरकार के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें सरकार ने गुलबर्ग जिले में लघु विधानसभा स्थानांतरित करने का प्रस्ताव किया था. इसके बाद एक अजीब सी जनहित याचिका दायर की गई, जिसमें स्वामी अनुकूल चंद्र ठाकुर को ही एक मात्र भगवान माने जाने के निर्देश देने की मांग करने वाले याचिकाकर्ता पर एक लाख रुपए का जुर्माना लगाते हुए याचिका को खारिज कर दिया था.
सुप्रीम कोर्ट ने लगाया 25 लाख रुपए का जुर्माना
कोर्ट ने कहा था कि आप चाहे जो माने लेकिन आप देश के सभी नागरिकों को श्री श्री अनुकूल ठाकुर को भगवान मानने को कैसे कह सकते हैं? सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र का बार-बार दुरुपयोग करते हुए 64 जनहित याचिकाएं दाखिल करने पर एक एनजीओ पर 25 लाख रुपए का जुर्माना लगाया था. कोर्ट ने कहा था कि याचिकाकर्ता द्वारा ट्रस्ट और उसके अध्यक्ष राजीव दहिया ने अपने अधिकार क्षेत्र का दुरुपयोग किया है.
इसी तरह देश के अलग-अलग हाई कोर्ट्स भीकई जनहित याचिकाओं पर जुर्माना लगा चुका है. सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में कई जनहित याचिका दायर करने वाले शशांक देव सुधि ने कहा कि 1986 में सीजेआई पीएन भगवती ने जनहित याचिका को जरूरी बताया था.
उसके बाद से ही जनहित याचिका अदालतों में दाखिल होने लगी, इनका मानना है कि मात्र 5 फीसदी ही जनहित याचिका ऐसी होती है जो सुनवाई योग्य नही होती है. इसलिए इसको न्यायिक समय की बर्बादी बताना गलत है. जबकि सुप्रीम कोर्ट के वकील सत्यम सिंह राजपूत ने कहा कि कई बार हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट अखबार या मीडिया रिपोर्ट के आधार पर भी जनहित या समाज से जुड़े मामले पर स्वतः संज्ञान लेती है. सभी हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में एक पत्र विभाग होता है. जहां पर पत्रों के माध्यम से भी याचिका दायर की जा सकती है और अगर कोर्ट उसमें जनहित का मामला देखता है तो उसपर स्वतः संज्ञान लेते है.
साथ ही केंद्र सरकार, राज्य सरकार और संबंधित विभागों को नोटिस जारी कर जवाब मांगता है.
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-भारत एक्सप्रेस
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