दिल्ली हाईकोर्ट ने पाक्सो के एक मामले में पीड़िता को शारीरिक रूप से पेश होने में छूट नहीं देने पर आलोचना की. जस्टिस गिरीश कठपालिया ने कहा कि इस तरह के मामलों में पीड़िता पर विशेष ध्यान देना चाहिए. क्योंकि जब उन्हें अदालत के समक्ष गवाही देने के लिए बुलाया जाता है, तो उन्हें अपने पीड़ा में फिर से जीना पड़ता है.
जस्टिस ने यह भी कहा कि शारीरिक रूप से उपस्थित होने से छूट देने की मांग विशेष विचार किया जाना चाहिए. उन्होंने पाया कि पीड़िता के वकील ने निचली अदालत को सूचित किया था कि पीड़िता बीमार है. इसलिए वह अगली सुनवाई में शारीरिक रूप से पेश नहीं हो सकती. फिर अदालत ने संबंधित थानेदार को सुनवाई अगले दिन करने से पहले यह जांच करने को कहा कि क्या वास्तव में पीड़िता बीमार है या नहीं.
बीमारी के बावजूद पेशी पर जोर
जस्टिस ने इससे असहमति जताई. उन्होंने कहा कि यौन हिंसा की पीड़िता को अदालत में गवाही के लिए बुलाए जाने पर घबराहट और पीड़ा के कारण दस्त और बुखार आदि होने की संभावना होती है. यह कोई अप्रत्याशित बात नहीं है कि पीड़िता पहली बार में ही बयान देने का साहस करेगी. पीड़ित को वास्तव में आघात से उबरना पड़ता है. कोर्ट इस मामले में 28 अप्रैल को अगली सुनवाई करेगा.
कोर्ट ने कहा कि भले ही निचली अदालत ने थानेदार या जांच अधिकारी को भेजा था, लेकिन बलात्कार पीड़िता की स्थिति की जांच के लिए एक पुरु ष कांस्टेबल को भेजा गया. उन्होंने इस चूक पर सहायक पुलिस आयुक्त (एसीपी) से रिपोर्ट मांगी है. न्यायमूर्ति ने इस बात की भी निंदा की कि मामले की गंभीरता के बावजूद न तो आईओ एसआई रितु और न ही संबंधित एसएचओ सुनवाई के दौरान पेश हुए. न्यायमूर्ति ने यह टिप्पणी दो आरोपियों की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए की.
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-भारत एक्सप्रेस
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