आई लाइव मुहम्मद पोस्टर लगाने के मामले को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई है. दायर जनहित याचिका में मुस्लिम समुदाय के लोगों के खिलाफ आई लाइव मुहम्मद पोस्टर लगाने दर्ज एफआईआर और गिरफ्तारी को चुनौती दी गई है. यह याचिका मुस्लिम स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन ऑफ इंडिया और सुन्नी समूह रजा अकादमी की ओर से दायर की गई है.
त्योहार के मौके पर लगाए गए थे पोस्टर
दायर याचिका में कहा गया है कि यह एफआईआर साम्प्रदायिक प्रकृति की है और मुस्लिम समुदाय के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है. याचिका में यह भी दावा किया गया है कि सामान्य नागरिकों ने धार्मिक त्योहार मनाने और ईश्वर के प्रति भक्ति प्रकट करने के लिए पोस्टर और बैनर लगाए थे. ये पोस्टर मिला-उन-नबी त्योहार के मौके पर लगाए गए थे, जो पैगम्बर हजरत मोहम्मद साहब की याद में मनाया जाता है.
आरोप है कि बिना ठोस सबूत के.इन्हें दंगों, आपराधिक धमकी और शांति भंग करने के मामलों में फंसा दिया गया. दायर याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड पुलिस ने बिना किसी ठोस सबूत के.समुदाय विशेष के लोगों पर झूठे और सांप्रदायिक एफआईआर दर्ज किए हैं.
तत्काल न्यायिक हस्तक्षेप की हुई मांग
दायर जनहित याचिका भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दायर की गई है. इसमें याचिककर्ताओ के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए तत्काल न्यायिक हस्तक्षेप की मांग की गई है. ये सभी अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय से हैं और इन्हें 20 सितंबर की एफआई में झूठे तरीके से फंसाया गया है.
यह एफआईआर पुलिस स्टेशन कैसरगंज, जिला बहराइच में भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 187 (जानबूझकर चोट पहुचाने की सजा), धारा 351 (आपराधिक धमकी), धारा 187 (2)/188( दंगा/गैरकानूनी जमावड़ा) और 356 ( शांति भंग करने के इरादे से जानबूझकर अपमान) के तहत दर्ज की गई है.
यह विवाद नौ सितंबर को शुरू हुआ, जब कानपुर पुलिस ने बारावफात जुलूस के दौरान सार्वजनिक सड़क पर आई लव मुहम्मद लिखे बोर्ड लगाने के आरोप में नौ नामजद और 15 अज्ञात लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई थी.
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-भारत एक्सप्रेस
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