दिल्ली हाईकोर्ट.
दिल्ली हाई कोर्ट ने विकल्पिक दुकान आवंटन की मांग को खारिज करते हुए अहम आदेश दिया है. कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि दिल्ली मेट्रों रेल कॉर्पोरेशन (डीएमआरसी) की परियोजना प्रभावित व्यक्तियों के लिए पुनर्वास नीति के तहत वैकल्पिक दुकान का अधिकार केवल उन दुनकदारों को मिलेगा जो अधिग्रहण से पहले संबंधित दुकान से वास्तव में व्यवसाय कर रहे थे.
मालिक होना पर्याप्त नहीं
जस्टिस अमित शर्मा की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि वैकल्पिक दुकान पाने का लाभ उठाने के लिए याचिकाकर्ता को यह साबित करना होगा कि वह उक्त दुकान से व्यवसाय कर रहा था. सिर्फ मालिक होने से कोई अधिकार नहीं मिल जाता है.
मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने दलील देते हुए कहा कि दुकान उस समय पारिवारिक कारणों से बंद थी और नीति में केवल मालिकाना हक ही पर्याप्त है. कोर्ट ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि इसको मान लेने से सर्वेक्षण की प्रक्रिया ही निर्रथक हो जाएगी. कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट कर दिया है कि नीति का उद्देश्य केवल उन लोगों का पुनर्वास करना है, जो वास्तव में व्यापार कर रहे थे.
बिजली बिल से स्पष्ट हुई बात
पुनर्वास के मामले में मालिक और किरायेदारों में कोई भेदभाव नहीं किया गया है. कोर्ट ने कहा कि यही मानदंड आवासीय पुनर्वास पर भी लागू होता है. डीएमआरसी ने पुनर्वास का दावे को ठुकरा दिया था. डीएमआरसी ने कहा कि सर्वेक्षण व मूल्यांकन रिपोर्ट में संबंधित दुकान बंद पाई गई. बिजली बिल में 40 से 90 की मामूली खपत दर्ज थी, जिससे स्पष्ट है कि वहां कोई व्यावसायिक गतिविधि नहीं चल रही थी.
बता दें कि यह मामला दिल्ली मेट्रो की मास रैपिड ट्रांजिट सिस्टम परियोजना के लिए अधिग्रहण भूमि से जुड़ा था. भूमि के मालिक (याचिकाकर्ता) ने दावा किया कि वह दुकान में एक पर्यटन कार्यालय चला रहे थे और डीएमआरसी नीति के तहत विकल्पिक भूखंड की मांग की.
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-भारतए एक्सप्रेस
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