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सुप्रीम कोर्ट में संविधान दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में भावुक हुई राष्ट्रपति, पिता का दिया उदाहरण

संविधान दिवस के अवसर पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संविधान के आदर्शों और सामाजिक न्याय की अहमियत पर जोर दिया. सीजेआई सूर्यकांत ने 24 साल बाद संविधान के 100 साल पूरे होने पर आत्ममंथन की आवश्यकता पर प्रकाश डाला.

संविधान दिवस के अवसर पर सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन द्वारा आयोजित कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कहा कि कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका ने संविधान के आदर्शों का पालन किया है और उसकी गरिमा को बनाए रखा हैं. इसके लिए मैं इन तीनों स्तंभों से जुड़े लोगों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करती हूं. राष्ट्रपति ने पिता को याद करते हुए कहा कि आगे बढ़ो, लेकिन आगे बढ़ने के साथ पीछे मुड़ कर देखना भी जरूरी है. फिर पिता की कही बात को पूरा करते हुए समाज को एक बड़ा संदेश दिया. उन्होंने कहा पिताजी कहा करते थे. सिर्फ आगे बढ़ना बहादुरी नहीं है, बल्कि तुम्हारे पीछे चल रहे लोगों की हिम्मत बढ़ाना और पीछे वालो को आगे बढ़ाना असली बहादुरी है.

बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर के प्रति हार्दिक सम्मान व्यक्त करने के उद्देश्य से वर्ष 2015 में उनकी 125 वीं जयंती के अवसर पर, यह निर्णय लिया गया कि 26 नवंबर को प्रतिवर्ष संविधान दिवस के रूप में मनाया जाएगा. उन्होंने कहा कि बाबा साहेब अंबेडकर ने न केवल वंचित वर्गों के उत्थान के लिए, बल्कि संपूर्ण राष्ट्र की संरचना और विकास को ध्यान में रखकर कार्य किया. संविधान सभा में उनके गंभीर भाषण उनके व्यापक योगदान को स्पष्ट करते है. उन्होंने कहा कि बाबासाहेब की तरह दलित वर्ग से आने वाली संविधान सभा की सदस्य दक्षायणी वेलायुधन ने वंचितों और महिलाओं के लिए आवाज उठाई और संपूर्ण समाज व राष्ट्र निर्माण की दृष्टि से कार्य किया.

हर पीढ़ी के लिए मार्गदर्शक

संविधान सभा में अपने एक भाषण में उन्होंने कहा था कि संविधान सभा न केवल संविधान का निर्माण करती है, बल्कि लोगों को जीवन जीने का एक नया तरीका भी प्रदान करती है. इससे स्पष्ट होता है कि संविधान सभा के सदस्य अपनी जिम्मेदारी और भूमिका को अत्यंत व्यापक परिपेक्ष्य में देख रहे थे. भारत की हमारी भावी पीढियां उनकी दूरदर्शी दृष्टि से लाभान्वित होती रहेंगी. राष्ट्रपति ने कहा कि हमारा.संविधान हमारे जीवन और हमारी शासन प्रणाली का एक गतिशील मूलभूत पाठ है. उन्होंने कहा कि संविधान सभा से लेकर आज की संसद तक, महिलाओं, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और पिछड़े वर्गों के प्रतिनिधियों ने देश को सामाजिक न्याय के आदर्श पर आगे बढ़ाना जारी रखा है.

शताब्दी से पहले आत्ममंथन का समय- CJI सूर्यकांत

संविधान के अनुसार हमारे संवैधानिक संस्थानों में लोकतंत्र के विभिन्न स्तर दिखाई देते हैं. यह हमारी संवैधानिक प्रणाली के लिए बड़ी उपलब्धि है. सीजेआई सूर्यकांत ने कहा 24 साल बाद हम संविधान के 100 साल का उत्सव मनाएंगे. राष्ट्रपति ने कहा कि क्या हमने पीछे मुड़कर देखा कि संविधान में लिखी स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा के शब्दों को कितना साकार कर पाए? क्या अगले 24 साल में हम पा सकेंगे? डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की 125 वी जयंती के अवसर पर, 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संविधान दिवस मनाने की शुरुआत की थी. इसका उद्देश्य नागरिकों में संवैधानिक मूल्यों के प्रति जागरूकता बढ़ाना है.

भारतीय संविधान में शुरुआत में 395 अनुच्छेद थे, लेकिन समय-समय पर इसमें संशोधन होते रहे है, वर्तमान में भारतीय संविधान में कुछ 448 अनुच्छेद है. इन अनुच्छेदो में देश की राजनीति, न्याय व्यवस्था, नागरिक अधिकारों और कर्तव्यों से जुड़े विभिन्न प्रावधान शामिल है. संविधान के अनुच्छेद समय-समय पर देश की बदलती जरूरतों के अनुसार अपडेट किए जाते है.

भारत के लोकतंत्र का पहला कदम

संविधान सभा में कुल 299 सदस्य थे, जिनमें से 299 भारतीय प्रतिनिधि थे, और 70 ब्रिटिश भारत के थे, इसमें विभिन्न प्रांतों, समुदायों और राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि शामिल थे, जो भारतीय संविधान के निर्माण में भागीदार बने. संविधान सभा ने 2 साल 11 महीने और 18 दिनों में भारतीय संविधान को तैयार किया, जिसे 26 नवंबर 1949 को अपनाया गया.

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-भारत एक्सप्रेस



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