सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) बी.आर. गवई ने न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism) को सामाजिक न्याय का महत्वपूर्ण साधन बताते हुए चेतावनी दी है कि यह कभी ‘न्यायिक आतंकवाद’ (ज्यूडिशियल टेररिज्म) में तब्दील नहीं होना चाहिए. ANI को दिए एक विशेष इंटरव्यू में गवई ने ‘बुलडोजर जस्टिस’ जैसे विवादास्पद मुद्दों पर अपनी राय रखी. उन्होंने संविधान की शक्तियों के पृथक्करण (Separation Of Powers) पर जोर देते हुए कहा कि न्यायपालिका को अपनी सीमाओं का पालन करना होगा. यह इंटरव्यू उस समय आया है जब देश में न्यायिक हस्तक्षेप को लेकर बहस तेज हो रही है.
#WATCH | Delhi: In an interview to ANI, former CJI B.R. Gavai says, “…there are limits within which judicial activism should act. As I always say, judicial activism should not turn into judicial terrorism. Ultimately, our Constitution believes in the separation of power between… pic.twitter.com/j5vCquY4cs
— ANI (@ANI) November 26, 2025
न्यायिक सक्रियता की सीमाएं: सामाजिक न्याय का वाहक, लेकिन अतिरेक नहीं
पूर्व CJI बी.आर. गवई ने बताया कि 1980 के दशक से न्यायिक सक्रियता का दौर चला आ रहा है, जब अदालतें पोस्टकार्ड याचिकाओं तक सुनने लगीं. उन्होंने कहा, “कई मामलों में नागरिकों की सामाजिक-आर्थिक कमजोरियों के कारण वे सीधे अदालत नहीं पहुंच पाते. ऐसे में जनहित याचिका (PIL) के जरिए उनकी आवाज उठाना आर्थिक और सामाजिक न्याय का वादा पूरा करता है.”
उन्होंने साफ शब्दों में कहा, “न्यायिक सक्रियता की अपनी सीमाएं हैं. यह ‘न्यायिक आतंकवाद’ में नहीं बदलनी चाहिए. हमारा संविधान विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच शक्तियों का पृथक्करण मानता है.” गवई का यह बयान जलीकट्टू या पटाखों जैसे मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप की आलोचना के संदर्भ में प्रासंगिक है, जहां आलोचक इसे कार्यपालिका में हस्तक्षेप मानते हैं.
#WATCH | Delhi: In an interview to ANI, former CJI B.R. Gavai says, “…Like we did in the demolition judgment or the bulldozer justice, when we found that the executive was acting in excess, when we found that the executive was acting as a judge merely because a citizen was… pic.twitter.com/saW24ILHun
— ANI (@ANI) November 26, 2025
बुलडोजर पर टिप्पणी: कार्यपालिका की मनमानी को रोका, दिशानिर्देश जारी
‘बुलडोजर जस्टिस’ पर पूर्व CJI बी.आर. गवई ने विस्तार से बात की. उन्होंने कहा, “हमने विध्वंस के फैसले में पाया कि कार्यपालिका अतिरेक कर रही थी. केवल अपराधी होने के कारण किसी के घर को तोड़ना न केवल उसके अधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि घर के अन्य सदस्यों—भाई-बहन, माता-पिता, बच्चों—के अधिकारों का भी. यह कानून को हाथ में लेना जैसा है.” सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दिशानिर्देश जारी किए थे, जिसमें कहा गया कि आवास का अधिकार मौलिक है.
पूर्व CJI बी.आर. गवई ने आगे बताया, “हमने नागरिकों को हाईकोर्ट के दरवाजे खटखटाने की छूट दी. अदालत के आदेशों का उल्लंघन करने वाले को अवमानना का दोषी ठहराया जाएगा. यदि विध्वंस अवैध पाया गया, तो सरकार को घर दोबारा बनाना होगा और दोषियों से राशि वसूलनी होगी.” यह फैसला कई राज्यों में ‘बुलडोजर जस्टिस’ पर लगाम लगा सकता है, जहां इसे अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ हथियार माना जा रहा है.
#WATCH | Delhi: On ‘bulldozer action’, former CJI B.R. Gavai says in an interview to ANI, “We had given a liberty to the citizens to knock the doors of the High Courts wherever there was a violation and we had also expected that wherever such grievances were brought to the notice… pic.twitter.com/EIUVbzEdex
— ANI (@ANI) November 26, 2025
क्या कार्यपालिका या राजनेताओं से दबाव झेलना पड़ा: ‘नहीं, बिल्कुल नहीं’
इंटरव्यू के अंत में जब गवई से पूछा गया कि क्या उन्होंने कभी कार्यपालिका या राजनेताओं से दबाव का सामना किया, तो उन्होंने साफ इनकार किया- “नहीं, बिल्कुल नहीं,” उन्होंने कहा, “शनिवार को पत्रकारों से मिलते हुए भी मैंने यही जवाब दिया था.” यह बयान न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सवाल उठाने वालों के लिए महत्वपूर्ण है. गवई का कार्यकाल (जुलाई 2024 से नवंबर 2025 तक) विवादास्पद फैसलों से भरा रहा, लेकिन उन्होंने हमेशा संवैधानिक मूल्यों का पालन किया.
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