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‘सामाजिक सुधार के नाम पर धर्म को खोखला नहीं किया जा सकता’, सबरीमाला मामले में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी

सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश मामले की सुनवाई के दौरान 9 जजों की संविधान पीठ ने कहा कि मंदिर में प्रवेश के अधिकार पर विचार करते समय यह देखना जरूरी है कि याचिकाकर्ता श्रद्धालु है या नहीं है.

Sabarimala Temple Case, Supreme Court

सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर हो रही सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पूछा कि क्या उत्तर भारत में रहने वाला कोई गैर-आस्तिक व्यक्ति, किसी सुदूर मंदिर में प्रवेश के अधिकार का दावा कर सकता है. कोर्ट ने इंदिरा जयसिंह की दलीलों पर कहा कि सामाजिक सुधार के नाम पर धर्म को खोखला नहीं किया जा सकता.

सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली 9 जजों की संविधान पीठ सुनवाई कर रही है. सुनवाई के दौरान कोर्ट ने इस बात पर पर जोर दिया कि मंदिर में प्रवेश के अधिकार का फैसला करते समय श्रद्धालु और गैर श्रद्धालु के बीच अंतर जरूरी है. सुनवाई के दौरान जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि इस अधिकार का दावा कौन कर रहा है? क्या कोई श्रद्धालु इस अधिकार का दावा कर रहा है या किसी के कहने पर कोई गैर-श्रद्धालु? एक व्यक्ति जिसका इस मंदिर से कोई लेना देना नहीं है और वह उत्तर भारत मे कही है. जबकि यह मंदिर दक्षिण भारत में है. क्या प्रवेश के अधिकार का दावा करने वाले व्यक्ति की स्थिति पर भी विचार किया जाना चाहिए. उन्होंने यह भी कहा कि हम इसलिए मजबूत हैं क्योंकि हम विविध हैं. विविधता ही हमारी ताकत है. उस सुरक्षा को देकर ही देश मे एकता बनी रहती हैं. इसलिए विविधता का सम्मान करें.

सुप्रीम कोर्ट में मंदिर प्रवेश पर बहस

वही जस्टिस बागची ने इंदिरा जयसिंह से पूछा कि महिलाओं के प्रवेश पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं है, यह अंतर संबंधी प्रतिबंध है. क्या आप कह रहे हैं और यह असंवैधानिक है? जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि नास्तिक या भक्त का धार्मिक मामलों से कोई लेना-देना नहीं है. क्या यह कोर्ट अंतरात्मा के मामलों पर फैसला सुना सकता है? इंदिरा जय सिंह ने कहा कि शिरूर मठ का कहना है कि अनुच्छेद 25 (1) के तहत किसी व्यक्ति के अधिकारों का पर्याप्त रूप से हनन नहीं किया जा सकता, क्या यह पर्याप्त है या नहीं?यह पहला सवाल है. दूसरा सामंजस्य स्थापित करने की प्रक्रिया में यह माना गया है कि अनुच्छेद 25 (1) के तहत किसी व्यक्ति के अधिकारों को पर्याप्त रूप से चोट नहीं पहुचाई जा सकती, क्या यह पर्याप्त चोट है या नही? उन्होंने कहा कि मेरा अगला तर्क है कि समानता का कोई भी उल्लंघन अनुच्छेद 25 (1) के तहत अधिकार का पर्याप्त हनन है. समानता से इनकार करना अनुच्छेद 25 (1) के अर्थ में पयाप्त चोट है.

मामले की सुनवाई के दौरान सीजेआई सूर्यकांत ने पीछे बैठे एक वकील को कार्यवाही को फोन पर रिकॉर्ड करने की कोशिश करने पर फटकार लगाई है. कोर्ट ने पूछा कि आप अपने फोन से क्या कर रहें हैं? इसे अंदर रखिये. सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि अदालत की कार्यवाही रिकॉर्ड करने की कोशिश मत कीजिए.

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-भारत एक्सप्रेस



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