दिव्यांगता अधिकारों और उससे आगे हाशिए पर न्याय और वकालत विषय पर आयोजित समारोह के दौरान जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि न्याय वही है जो सुलभ दृश्यमान और मानवीय गरिमा से जुड़ा हो. उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि डिजिटलीकरण में समावेशन नहीं हुआ, तो यह न्याय व्यवस्था में नई असमानता का चेहरा बन सकता है. यह सम्मेलन जस्टिस सुनंदा भंडारे फाउंडेशन की ओर से आयोजित की गई थी.
जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि अनुच्छेद 39 (ए) के तहत मुफ्त विधिक सहायता का प्रावधान है, लेकिन इसकी प्रतिबद्धता आज भी आंशिक रूप से पूरी हो पाई है. उन्होंने जोर दिया गया वास्तविक न्याय तक पहुच सुनिश्चित करने के लिए जन केंद्रित और प्रौद्योगिकी आधारित दृष्टिकोण की जरूरत है. जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि विकलांग, महिलाएं और बच्चे जैसे हाशिए पर खड़े समूह न्याय पाने में अब भी बाधाओं का सामना कर रहे है, और डिजिटल खाई ने इन चुनौतियों को बढ़ा दिया है.
जागरूकता और संवेदनशीलता का आह्वान
उन्होंने सुझाव दिया गया बहुभाषी और सांस्कृतिक रूप से समावेसी डिजिटल प्लेटफार्म, वर्चुअल लोक अदालतें और आवाज- आधारित सरल कानूनी तकनीकी उपकरण विकसित किए जाए. उन्होंने कहा कि मध्यस्थों को स्थानीय भाषा आनी चाहिए ताकि वादी भावनात्मक रूप से जुड़ सके. जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि बिहार के एक दिहाड़ी मजदूर के लिए आवाज आधारित बहुभाषी और आसान कानूनी तकनीकी की जरूरत है. उन्होंने एआई के इस्तेमाल की वकालत की.
इस सम्मेलन में शामिल जस्टिस मनमोहन ने कहा कि अदालतों ने विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों से संबंधित मुद्दों पर फैसला दिया है और आगे भी देंगे, लेकिन यह जिम्मेदारी केवल न्यायपालिका की नही है. राज्यों के अन्य अंगों को भी इस अवसर पर आगे आना होगा. उन्होंने यह भी कहा कि इस मामले में जागरूकता और संवेदनशीलता की जरूरत है. उन्होंने कहा, जरूरत है कि समाज में जागरूकता फैलाई जाए, ताकि लोग कौन और दिव्यांगों के अधिकारों को समझे. क्योंकि जब समाज समझेगा तो अदालतें भी बेहतर समझेगी.
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-भारत एक्सप्रेस
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