मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़े एक संवेदनशील मामले में नया मोड़ आ गया है. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा हाल ही में दिए गए विभाजित फैसले को वापस लेने की मांग करते हुए शीर्ष अदालत में एक नई अर्जी दाखिल की गई है. अर्जी में पीठ का हिस्सा रहे जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा के बेटे के चुनाव आयोग के पैनल में होने को लेकर हितों के टकराव और पक्षपात की आशंका जताई गई है.
वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायण ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने इस याचिका पर जल्द सुनवाई की मांग की. जिस पर सीजेआई ने स्पष्ट कहा, ‘हम इस मामले की जांच करेंगे और इस पर उचित फैसला लेंगे.’
क्या है हितों के टकराव का पूरा मामला?
कांग्रेस नेता डॉ. जया ठाकुर समेत अन्य याचिकाकर्ताओं की ओर से दाखिल इस अर्जी में कहा गया है कि जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा के बेटे, सिद्धार्थ शर्मा, जुलाई 2024 से मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में भारत निर्वाचन आयोग के स्टैंडिंग काउंसिल हैं. ऐसे में याचिकाकर्ता ने निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए कहा है कि जस्टिस शर्मा को नैतिक आधार पर इस मामले की सुनवाई से खुद को अलग कर लेना चाहिए था.
इससे पहले यह मामला जस्टिस दीपांकर दत्ता की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने उठाया गया था, लेकिन उन्होंने इसे सीजेआई के पास भेजने का निर्देश दिया, क्योंकि मामला उनके बोर्ड से हटा दिया गया था.
विभाजित फैसले के बाद CJI के पाले में गेंद
मालूम हो कि इस मामले पर सुनवाई करते हुए जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने अलग-अलग (विभाजित) फैसला सुनाया था. जस्टिस दत्ता ने केंद्र सरकार की उस मांग को खारिज कर दिया था, जिसमें मामले को संविधान पीठ को भेजने को कहा गया था. इसके विपरीत, जस्टिस शर्मा का मानना था कि संविधान के अनुच्छेद 145(3) के तहत इस मुद्दे को 5 जजों की संविधान पीठ के पास भेजा जाना चाहिए. फैसला एकमत न होने के कारण मामला सीजेआई के पास लंबित है.
CJI को चयन समिति से बाहर करने पर विवाद
दरअसल, यह पूरा विवाद केंद्र सरकार के 2023 के उस नए कानून को लेकर है, जिसके तहत चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करने वाली चयन समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश को बाहर कर दिया गया है. नई व्यवस्था के तहत समिति में प्रधानमंत्री, एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता शामिल हैं.
याचिकाकर्ताओं की तरफ से कोर्ट में दलील दी गई कि जब प्रधानमंत्री और उनके द्वारा नामित कैबिनेट मंत्री समिति में होंगे, तो विपक्ष के नेता की राय को नजरअंदाज करना बेहद आसान है. इस तरह चयन प्रक्रिया एकतरफा हो जाती है और चुनाव आयोग की राजनीतिक निष्पक्षता से समझौता होता है.
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-भारत एक्सप्रेस
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