Shiv Sena Symbol Dispute: सुप्रीम कोर्ट ने शिवसेना पार्टी सिंबल विवाद मामले में दायर याचिकाओं पर 30 जुलाई को सुनवाई करेगा. मामले की सुनवाई के दौरान सीजेआई सूर्यकांत ने नाराजगी जताते हुए कहा, पहले आप अपने लोगों को मीडिया में जाकर यह कहने से रोके कि सुप्रीम कोर्ट फैसला नहीं सुना रहा है और इस तरह के गैरजिम्मेदाराना बयान देने से रोके.
सीजेआई ने कहा कि जब मामला सुनवाई के लिए सूचीबद्ध होता है तो आप तारीख ले लेते है और मीडिया में जाकर बयान देते है. मैं इसे बर्दास्त नहीं करूंगा. कृपया सावधान रहें.
जुलाई से अंतिम सप्ताह में सूचीबद्ध
वही याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील देवदत्त कामत ने कहा कि इस मामले में कुछ घंटों की जरूरत है. जब भी आपके पास समय हो, हम इसे कुछ दिनों में निपटा सकते हैं. हमें कोई आपत्ति नहीं है. हम तीन साल से तैयार है. वही वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने कहा कि कृपया इसे जुलाई से अंतिम सप्ताह में सूचीबद्ध करें. सीजेआई ने कहा कि समस्या राजनेताओं द्वारा दिए जा रहे बयानों से है. हम शाम 4 बजे के बाद तक बैठे रहते हैं.
चुनाव आयोग के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती
रोहतगी ने कहा कि दोनों पक्षों में से इस तरह के बयान नहीं दे सकता. पिछली सुनवाई में सीजेआई सूर्यकांत ने कहा था कि देश की राजनीतिक पार्टियां हमेशा चुनाव मोड़ में रहती हैं. वही कोर्ट ने मामले में उद्धव ठाकरे गुट की ओर से दायर अवमानना याचिका को वापस लेने की अनुमति दे दी थी.
उद्धव ठाकरे गुट ने चुनाव आयोग के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है. पिछली सुनवाई के वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा था कि वह सुप्रीम कोर्ट के 2023 के संविधान निर्णय पर भरोसा कर रहे हैं, जिसमें कहा गया था कि विधायी बहुमत को यह तय करने के लिए मानदंड के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता कि कौन-सा गुट असली पार्टी है.
संवैधानिक स्थिति को कमजोर करने का काम
उन्होंने कहा था कि चुनाव आयोग ने केवल विधायी बहुमत का परीक्षण के आधार पर निर्णय लिया. बता दें कि 2022 में शिवसेना के दो फाड़ हो गया था. शिवसेना में फूट पड़ने के बाद चुनाव आयोग ने शिवसेना और धनुष-बाण का चुनाव चिन्ह एकनाथ शिंदे को दे दिया था. दायर याचिका में ठाकरे ने दलील दी कि चुनाव आयोग इस बात को समझने में विफल रहा है कि याचिकाकर्ता को पार्टी के कार्यकर्ताओं और कार्यकर्ताओं से भारी समर्थन हासिल है.
इसके अलावा याचिका में यह भी कहा है कि चुनाव आयोग के पैरा 15 के तहत विवादों के तटस्थ मध्यस्थ के रूप में अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने में विफल रहा है और उसने अपनी संवैधानिक स्थिति को कमजोर करने का काम किया है.
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-भारत एक्सप्रेस
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