सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के सत्यापन (SIR) की प्रक्रिया को लेकर अपने पिछले आदेश में महत्वपूर्ण संशोधन और स्पष्टीकरण जारी किया है. सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पांचोली की विशेष पीठ ने इस पूरी कवायद को समयबद्ध तरीके से पूरा करने के लिए कड़े निर्देश दिए हैं.
दस्तावेजों को सौंपने की समय-सीमा तय
अदालत ने आदेश दिया है कि 14 फरवरी 2026 तक प्राप्त सभी दस्तावेज, जो अब तक पोर्टल पर अपलोड नहीं किए गए हैं, उन्हें संबंधित ईआरओ (ERO) और एईआरओ (AERO) द्वारा कल शाम 5 बजे तक अनिवार्य रूप से पीठासीन न्यायिक अधिकारियों को सौंप दिया जाए. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जन्मतिथि और माता-पिता की पहचान के सत्यापन के लिए 10वीं कक्षा का उत्तीर्ण प्रमाण पत्र (प्रवेश पत्र) एक आवश्यक दस्तावेज माना जाएगा.
न्यायिक अधिकारियों की कमी को लेकर विशेष निर्देश
कोलकाता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश द्वारा जताई गई चिंता पर संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अधिकारियों की संख्या बढ़ाने का आदेश दिया है.
सिविल जजों की भागीदारी: कोर्ट ने कहा कि यदि न्यायिक अधिकारी कम पड़ रहे हैं, तो सिविल जजों को भी इस काम में शामिल किया जाए.
पड़ोसी राज्यों से मदद: यदि इसके बावजूद काम पूरा नहीं होता, तो कोलकाता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ओडिशा और झारखंड के मुख्य न्यायाधीशों से न्यायिक अधिकारियों की मांग कर सकते हैं.
वर्तमान में 250 जिला जज स्तर के अधिकारी करीब 50 लाख दावों की जांच कर रहे हैं, जबकि कुल 80 लाख मामलों का सत्यापन होना बाकी है.
मतदाता सूची प्रकाशन और डेडलाइन
हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने सीजेआई को लिखे पत्र में बताया था कि 28 फरवरी 2026 की समय-सीमा तक 80 लाख मामलों का निपटारा करना चुनौतीपूर्ण है. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 142 की विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए निर्देश दिया:
यदि 28 फरवरी तक सभी सत्यापन पूरे नहीं होते, तो चुनाव आयोग अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित कर सकता है.
जो मामले लंबित रह जाएंगे, उनके लिए बाद में एक सप्लीमेंट्री (पूरक) सूची जारी की जाएगी.
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वैध दस्तावेज और पहचान के प्रमाण
कोर्ट ने यह भी साफ किया कि पहचान के प्रमाण के रूप में आधार कार्ड और अन्य सभी वैध सरकारी दस्तावेजों को स्वीकार किया जाएगा. 14 फरवरी 2026 से पहले भौतिक या डिजिटल रूप से जमा किए गए सभी दस्तावेजों को सत्यापन प्रक्रिया में शामिल किया जाना अनिवार्य है.
80 लाख मामले और 80 दिन का गणित
हाई कोर्ट के अनुसार, यदि एक अधिकारी हर दिन 250 मामलों का निपटारा करता है, तब भी इस पूरी प्रक्रिया में कम से कम 80 दिन का समय लगेगा. इसी कारण सुप्रीम कोर्ट ने युद्धस्तर पर काम करने और न्यायिक जनशक्ति बढ़ाने के विकल्प खुले रखे हैं ताकि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में पारदर्शिता बनी रहे.
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