सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट को एक जमानत के मामले में सुनवाई 43 बार टालने के लिए फटकार लगाई है. सुप्रीम कोर्ट ने रामनाथ मिश्रा बनाम केंद्रीय जांच ब्यूरों के मामले में यह आदेश जारी किया है.
कोर्ट ने सभी हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार से ऐसे फैसलों का ब्यौरा मांगा है, जिन्हें तीन महीने तक सुरक्षित रखा गया, लेकिन सुनाया नहीं गया है.
व्यक्तिगत स्वतंत्रता मामलों में बार-बार स्थगन स्वीकार नहीं
सीजेआई बी आर गवई और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने कहा कि अभियुक्त पहले ही साढ़े तीन साल से ज्यादा समय हिरासत में बिता चुका है और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मामलों में इस तरह के बार-बार स्थगन को स्वीकार नहीं किया जा सकता है.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संवैधानिक न्यायालयों को जमानत के मामलों पर तत्परता से विचार करना चाहिए. कोर्ट ने आगे कहा कि हमने बार-बार यह देख है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता से संबंधित मामलों पर अदालतों को अत्यंत शीघ्रता से विचार करना चाहिए. व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मामलों में हाईकोर्ट्स से यह अपेक्षा नहीं कि जाती है कि वे मामले को इतने लंबे समय तक लंबित रखें और समय-समय पर स्थगन के अलावा कुछ न करें. इसलिए अदालत अभियुक्त-याचिकाकर्ता को जमानत देने का आदेश जारी करती है.
जमानत याचिका पर 27 बार सुनवाई को टली
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी बताया कि इस वर्ष मई में उसने इसी मामले में एक सह-अभियुक्त को जमानत दे दी थी, क्योंकि हाई कोर्ट ने उसकी जमानत याचिका पर 27 बार सुनवाई को टाल दी थी. मामले की सुनवाई के दौरान सीबीआई की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एस. डी संजय ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि हाई कोर्ट में जमानत याचिका लंबित रहने के दौरान सुप्रीम कोर्ट द्वारा जमानत देना एक मिसाल कायम करेगा.
कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि सामान्यतः इस तरह के मामले में वो हस्तक्षेप नही करता जब तक कि याचिका हाई कोर्ट में लंबित हो. हालांकि कोर्ट ने कहा कि आसाधारण परिस्थितियों के कारण इस मामले में एक अपवाद बनाया गया. कोर्ट ने निर्देश दिया है कि याचिकाकर्ता रामनाथ मिश्रा को उपरोक्त मामलों मेंट्रायल कोर्ट की संतुष्टि पर जमानत पर रिहा किया जाए.
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-भारत एक्सप्रेस
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