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सीजेआई को मास्टर ऑफ रोस्टर कहा जाता है, लेकिन उनके एक फैसला चर्चा का विषय बना हुआ है. सीजेआई का यह कदम उनकी शक्तियों से परे है और जिससे न्याय में बाधा पड़ने का संकेत मिलता है. सीजेआई सूर्यकांत ने 29 सितंबर को एक प्रशासनिक आदेश जारी किया, जिसमें मनोज मिश्रा और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की विशेष बेंच बनाई गई है. ताकि 30 सितंबर को CA 13106/2024 में अवमानना याचिका 37/2026 पर सुनवाई हो सके. उन्होंने आगे लिखा कि ऐसा करके, सीजेआई ने सीधे तौर पर जस्टिस भुइयां और जस्टिस एस चंदुरकर की बेंच द्वारा 29 सितंबर को ही दिए गए एक न्यायिक आदेश में दखल दिया है.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बेंच बदलने का इस तरह का पिछले दरवाजा वाला तरीका सिस्टम की पारदर्शिता पर सीधा शक पैदा करता है. कोर्ट ने पूछा कि मामले को स्पेशल बेंच में भेजने से पहले संबंधित बेंच को क्यों नही बताया गया. यह विवाद तब हुआ जब जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अतुल चंदुरकर की बेंच के सामने सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया. सुनवाई के दौरान सभी पक्षकारों के वकील कोर्ट में मौजूद थे. तभी सुनवाई से ठीक पहले इस केस को लिस्ट से हटा दिया गया. इसपर कोर्ट ने कड़ा रुख अख्तियार करते हुए रजिस्ट्री से जवाब मांग लिया. बाद में सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर एक नोटिस आया, जिसमें बताया गया है मामले को एक स्पेशल बेंच के पास ट्रांसफर कर दिया गया है.
स्पष्टीकरण के अनुसार मामले को जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अतुल चंदुरकर की बेंच से इसलिए हटाया गया था, क्योंकि सरकारी वकील ने पहले सीजेआई के सामने यह बात रखी थी कि मामले को उस स्पेशल बेंच ने पास भेजा जाए को उसी विषय पर कानून की वैधता की जांच कर रही है.
आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने अवमानना के मामले से संबंधित कानून की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओ के साथ इस मामले को भी सूचीबद्ध कर दिया है. कोर्ट 15 अक्टूबर को सुनवाई करेगा. बता दें कि यह मामला सेंट्रल आर्म्ड फोर्सेज में 46 आईपीएस अधिकारियों की डेप्यूटेशन से जुड़ा था.
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