Singrauli Forest Coal Mining Case: सुप्रीम कोर्ट ने अडाणी समूह की कोयला खनन परियोजनाओं से जुड़े वन स्वीकृतियों को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया है. जिसके बाद याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका को वापस ले लिया है. जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने सभी पक्षों की दलीलों के बाद खारिज कर दिया है.
हाथियों के कॉरिडोर में आने का दावा
यह मामला मध्य प्रदेश के सिंगरौली वन क्षेत्र से जुड़ा है, जहां प्रस्तावित खनन क्षेत्र का एक हिस्सा हाथियों के कॉरिडोर में आने का दावा किया गया है. मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने अदालत को बताया कि यह बेहद गंभीर पर्यावरणीय मामला है और इसे सामान्य प्रतिद्वंद्वी मुकदमेबाजी की तरह नहीं देखा जाना चाहिए.
उन्होंने कहा कि करीब 6 लाख पेड़, जिनमें से कई पेड़ 500 साल से अधिक पुराने बताए जा रहें है, जो इस परियोजना के जद में है.
समयसीमा पार होने के आधार पर याचिका खारिज
याचिकाकर्ता ने कोर्ट से संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत हस्तक्षेप कर वन स्वीकृतियों की वैधता की जांच की मांग करते हुए कहा कि राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने याचिका को समयसीमा पार होने के आधार पर खारिज कर दिया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट की शक्तियां एनजीटी अधिनियम से सीमित नहीं होती.
याचिकाकर्ता के वकील ने यह भी कहा कि सीमा निर्धारण की गणना आदेश जारी होने की तारीख से नहीं, बल्कि उसके संप्रेषित होने की तारीख से होनी चाहिए.
कोर्ट का अनुमति देने से इनकार
उनके मुताबिक संबंधित आदेश केवल पर्यावरण मंत्रालय की वेबसाइट पर अपलोड किया गया था, जिसे विधिक रूप से उचित संप्रेषण नहीं माना जा सकता. याचिकाकर्ता ने कोर्ट से अनुच्छेद 226 या अनुच्छेद 32 के तहत नई याचिका दायर करने की अनुमति मांगी जिसे कोर्ट ने देने से इनकार कर दिया.
यह याचिका पर्यावरणविद अजय दुबे ने दायर की थी. जिसमें मई 2025 में दी गई पर्यावरणीय स्वीकृति को चुनौती दी गई है.
10 किलोमीटर परिधि में खनन गतिविधियों की अनुमति
दायर याचिका में कहा गया था कि सिंगरौली के घने वन क्षेत्र में लगभग 1500 हेक्टेयर वन भूमि को कोयला खनन के लिए आवंटित किया गया, जबकि वन विभाग की पूर्व साइट सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार यह क्षेत्र प्रस्तावित ‘एलिफेंट कॉरिडोर’ में आता है. नियमों के मुताबिक ऐसे कॉरिडोर की 10 किलोमीटर परिधि में खनन गतिविधियों की अनुमति दी जानी चाहिए.
अप्रैल 2024 में गठित समिति ने स्थल का निरीक्षण कर कोयला उत्खनन के विरुद्ध अनुशंसा की थी. समिति ने कहा था कि यहां हाथियों सहित कई वन्यजीवों की नियमित आवाजाही होती है. रिपोर्ट में चेतावनी दी गई थी कि खनन गतिविधियों से वन्यजीव आवास को गंभीर क्षति पहुचेगी.
यह भी पढ़े: ‘एन इनिया पोन निलवे’ गाने का मालिक कौन? दिल्ली हाई कोर्ट ने सुनाया बड़ा फैसला
-भारत एक्सप्रेस
इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.



