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‘एकतरफा फैसला कैसे ले सकते हैं स्पीकर?’; कैश कांड में फंसी जांच समिति की वैधता पर सुप्रीम कोर्ट में बहस

कैश कांड मामले में कथित आरोपी जस्टिस यशवंत वर्मा की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट 8 जनवरी को सुनवाई जारी रखेगा. याचिका में भ्रष्टाचार की जांच कर रही संसदीय समिति के गठन को चुनौती दी गई है.

कैश कांड मामले में कथित आरोपी जस्टिस यशवंत वर्मा की ओर से दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट 8 जनवरी को सुनवाई जारी रहेगा. जस्टिस यशवंत वर्मा ने भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच कर रही संसदीय समिति की वैधता को चुनौती दी है. दायर याचिका में कहा गया है कि समिति का गठन लोकसभा अध्यक्ष ने राज्यसभा अध्यक्ष से परामर्श किए बिना एकतरफा रूप से किया गया था.

मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस यशवंत वर्मा की ओर से पेश वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने कहा कि कानून के अनुसार जब संसद के दोनों सदनों में एक ही दिन कोई प्रस्ताव पेश किया जाता है, तो कोई समिति तब तक गठित नहीं कि जा सकती जब तक कि प्रस्ताव दोनों सदनों में.स्वीकार न हो जाए और एक संयुक्त समिति का गठन न कर दें.

मामले की सुनवाई के दौरान मुकुल रोहतगी ने कहा कि इस मामले में यह स्पष्ट है कि राज्यसभा के उपसभापति ने 11 अगस्त, 2025 को प्रस्ताव को खारिज कर दिया था. 21 जुलाई को प्रस्ताव पेश किया गया था. उसी दिन शाम को अध्यक्ष ने इस्तीफा दे दिया था. 11 अगस्त को उपसभापति ने प्रस्ताव को खारिज कर दिया था. सचिवालय की ओर से पेश वकील ने कहा कि यह याचिका गलत तथ्यों पर आधारित है और स्पीकर द्वारा जांच समिति के गठन के फैसले पर कोर्ट सवाल नही उठा सकता है, क्योंकि यह संसद के भीतर की कार्यवाही के अंतर्गत आता है.

संसदीय प्रक्रिया के दायरे में मामला

इसपर याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि जजेज इंक्वायरी एक्ट 1968 की धारा 3 केवल उसी स्थिति में लागू होती है, जब महाभियोग प्रस्ताव दोनों सदनों में स्वीकार किया जाए. वही जस्टिस दीपांकर दत्ता ने कहा कि तय नियमों के मुताबिक प्रोविजो को सेक्शन के हिस्से के तौर पर पढ़ा जाना चाहिए. इसमें कहा गया है कि कोई जॉइंट कमेटी तब तक नही बन सकतीजब तक कि दोनों सदनों में प्रस्ताव मंजूर न हो जाए. अगर प्रस्ताव मंजूर नही होता है तो इस बारे में कुछ नही कहा गया है. इसलिए इसे विधायिका के दायरे के हिसाब से पढ़ा जाना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लोकसभा अध्यक्ष की तरफ से लिया गया कमेटी बनाने का फैसला गलत कैसे हो सकता है.

इसपर जस्टिस वर्मा के वकील ने स्वीकार किया कि कानून में इसको लेकर स्पष्टता नही है. रोहतगी ने कहा कि राज्यसभा के अध्यक्ष इस्तीफा दे चुके थे. डिप्टी चेयरमैन को नोटिस अस्वीकार करने का फैसला नहीं लेना चाहिए था.



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